युग परिवर्तन का मार्ग: चिंतन, मंथन और क्रिया
14 जून प्रातःकालीन सत्र
मैंने बचपन में ही यह बात महसूस कर ली थी कि दुनिया ठीक दिशा में नहीं चल रही है। हमें या तो युग परिवर्तन की दिशा में कार्य करना होगा अथवा व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में कार्य करना होगा।
बचपन से ही मैं इस निष्कर्ष तक भी पहुँच चुका था कि सबसे पहले हमें चिंतन करना है, उसके बाद मंथन करेंगे। मंथन के बाद कोई निष्कर्ष निकलेगा और जब निष्कर्ष निकल जाएगा, तब क्रिया करेंगे। वर्तमान समय में जो निकले हुए निष्कर्ष हैं, वे निष्कर्ष ही गलत हैं, परिभाषाएँ ही गलत हैं, तो उन पर क्रिया करना उचित नहीं है।
मैंने यह सोचा कि हम पहले परिभाषाओं और निष्कर्षों पर अपना मत बनाएँगे और तभी काम शुरू करेंगे। मैंने जब प्रारंभ में चिंतन किया और चिंतन के बाद मंथन शुरू किया, तो मंथन में अनेक तरह के प्रयोग भी किए। तब मुझे दुनिया में चल रही सभी प्रकार की व्यवस्थाओं में गड़बड़ियाँ दिखाई दीं। मुझे यह महसूस हुआ कि वास्तव में व्यवस्था की गड़बड़ी के कारण लोगों का चरित्र गिरा है। इसके लिए व्यक्ति दोषी नहीं है, समाज दोषी नहीं है, बल्कि व्यवस्था दोषी है। हमारी सभी प्रकार की नीतियों में बदलाव की आवश्यकता है, लोग अपने आप सुधर जाएँगे।
मैंने लंबे समय तक मंथन किया और मंथन करने के बाद ऋषिकेश में वर्षों बैठकर निष्कर्ष निकाला कि इन सब समस्याओं का समाधान क्या हो सकता है। लेकिन दुर्भाग्य से निष्कर्ष निकालते-निकालते कोरोना आ गया और मैं क्रिया शुरू नहीं कर सका। जब कोरोना समाप्त हुआ, तब तक मेरा स्वास्थ्य और उम्र यह अल्टीमेटम देने लगे कि अब क्रिया करने का समय नहीं है।
फिर यह बात भी मैं समझता था कि विचारक क्रिया कर नहीं सकता, उसकी वह क्षमता नहीं होती। इसलिए अब उन निष्कर्षों के आधार पर हमारे सभी साथी मिलकर लगातार क्रिया की दिशा में संलग्न हैं।
मैं आश्वस्त हूँ कि चिंतन, मंथन और निष्कर्ष के बाद क्रिया शुरू हो रही है, तो हम सही प्रक्रिया से काम कर रहे हैं और इस क्रिया का परिणाम अच्छा निकलेगा, यह मुझे पूरा विश्वास है। हमारे सभी साथी इस दिशा में निरंतर सक्रिय हैं।
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