मोहन भागवत बनाम परंपरागत शंकराचार्य: विश्वास का प्रश्न
मैंने कुछ दिन पहले ही यह बात लिखी थी कि भारत में मोहन भागवत ही वास्तव में शंकराचार्य है। उन्हें हिंदुओं का सबसे अधिक सम्मान प्राप्त है और विश्वास भी प्राप्त है क्योंकि संघ की चयन प्रक्रिया बहुत अधिक विश्वसनीय है। संघ के सर्वोच्च पदाधिकारी लगभग समाज के लिए पूरी तरह समर्पित माने जाते हैं। दूसरी तरफ आप यह भी सोचिए कि एक शंकराचार्य चयन प्रणाली है जो इतनी गंदी है कि वहां अभी मुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक शंकराचार्य बन जाता है। वास्तव में यह अभी मुक्तेश्वरानंद की गलती नहीं है बल्कि हमारी शंकराचार्य बनाने की पद्धति ही गलत है। निर्वाचन प्रक्रिया में बदलाव किया जाना चाहिए। अभी राम मंदिर प्रकरण में जिस शंकराचार्य ने चंपत राय पर इतनी जल्दी प्रश्न खड़ा कर दिया वह आदमी वास्तव में शंकराचार्य बनने लायक नहीं है। अब तक की जानकारी के अनुसार चंपत राय शराफत में परेशान हो गए लेकिन चंपत राय ने जानबूझकर कहीं गलत किया है, ऐसी बात अब तक सामने नहीं आई है। इसके बाद भी हमारे इस शंकराचार्य ने इतनी जल्दबाजी में चंपत राय पर निर्णय कर दिया कि ऐसे शंकराचार्य पर भी संदेह पैदा हो जाता है। अभी जांच होते तक इस विषय पर अभी मुक्तेश्वरानंद को चुप रहना चाहिए था।
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