ट्रंप और मोदी: नेतृत्व शैली से तय होती है प्रतिष्ठा
अमेरिका के लोग भारत की अपेक्षा अधिक संतुलन बनाकर निर्णय करते हैं। यह बात कई सौ वर्षों से सर्वमान्य है, लेकिन यह बात भी सच है कि पिछले कुछ वर्षों से भारत के लोग भी वैचारिक धरातल पर संतुलन की दिशा में बढ़ रहे हैं। इसका स्पष्ट प्रमाण है कि अमेरिका में ट्रंप की प्रतिष्ठा लगातार गिर रही है और भारत में नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा लगातार बढ़ रही है। एक तरफ ट्रंप के रखे हुए बिल संसद में अमान्य हो जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी धीरे-धीरे दो-तिहाई बहुमत की ओर बढ़ रहे हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि नरेंद्र मोदी कम बोलते हैं, सोचकर बोलते हैं और ट्रंप अधिक बोलते हैं, बोलकर सोचते हैं।
आप एक बात विचार करिए कि ट्रंप ने अभी इटली की प्रधानमंत्री मिलोनी की जिस तरह अवमानना की, क्या वैसा किसी भी दृष्टि से उचित था? क्या सोचकर ट्रंप ने मिलोनी पर इस तरह की टिप्पणी कर दी? या तो यह बुढ़ापे का प्रभाव है अथवा ट्रंप की मूर्खता का। बड़बोलापन कभी लाभदायक नहीं होता और अमेरिका में तो बिल्कुल भी नहीं, क्योंकि अमेरिका की जनता अधिक सोच-समझकर निर्णय करती है।
मैं मानता हूँ, ईरान युद्ध में ट्रंप ने अभी तक कोई गलत कदम नहीं उठाया है, लेकिन ट्रंप ने अनावश्यक बोल-बोलकर अपने सही कदम को भी विवादास्पद बना दिया। आज यही कारण है कि ट्रंप की प्रतिष्ठा लगातार कम होती जा रही है और नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा लगातार दुनिया में बढ़ रही है।
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