वर्तमान चुनाव व्यवस्था: लोकतंत्र या गुलामी?

25 जुलाई प्रातःकालीन सत्र

भारत में जो चुनाव व्यवस्था है उस चुनाव व्यवस्था का प्रारंभिक उद्देश्य ही गलत है। इस चुनाव के माध्यम से हमें यह पूछा जाता है कि क्या वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था से आप सहमत हैं। हम चुनाव में मत देकर वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था से अपनी सहमति व्यक्त कर देते हैं। उसके साथ ही हमसे यह भी पूछा जाता है कि आप वर्तमान संविधान में मनमाने बदलाव के लिए वहाँ किस व्यक्ति को रखना चाहते हैं। इस तरह हम अपना वोट देकर वर्तमान संविधान के प्रति पूर्ण समर्थन व्यक्त कर देते हैं और यही हमारी गुलामी है।

एक तरह से हम जिसे चुनकर भेजते हैं वह हमारा मालिक बन जाता है क्योंकि वही संविधान संशोधन भी कर सकता है और वही कानून बना सकता है, वही कानून का पालन भी करा सकता है। इस तरह चुने गए लोग अप्रत्यक्ष रूप से मालिक बन जाते हैं और हम चुनाव में वोट देकर अपनी 5 वर्षों तक की गुलामी स्वीकार कर लेते हैं। हम उन्हें यह भी अधिकार दे देते हैं कि अगर वह चाहे तो 20 वर्ष के बाद भी चुनाव कर सकते हैं।

स्पष्ट है कि वर्तमान चुनाव प्रणाली ही हमारी गुलामी का प्रमुख कारण है और इसमें बदलाव होना ही चाहिए। संविधान बनाने वाली इकाई अलग और कानून बनाने या पालन करने वाली इकाई को अलग-अलग होना चाहिए। हम मालिक होंगे, संविधान सभा हमारी प्रतिनिधि होगी, राष्ट्रपति हमारे संरक्षक होंगे, कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका मिलकर हमारे मैनेजर होंगे और यदि इन तीनों के बीच पूरी सहमति नहीं बन पाती है तब अंतिम निर्णय हम जनमत संग्रह के माध्यम से करेंगे। यही लोकतंत्र होगा, यही भारतीय लोकतंत्र होगा, यही लोकतंत्र दुनिया में आगे बढ़ेगा। हम इस दिशा में जन जागरण कर रहे हैं।