जंतर-मंतर आंदोलन से समाज को क्या सीख मिली?

आज हम युवाओं और जैन जी के सफल आंदोलन पर दिनभर चर्चा करेंगे। यह बात तो हम लंबे समय से समझते रहे हैं कि चाहे परिवार हो या देश हो, युवाओं की ताकत बहुत अधिक होती है। परिवारों में भी मैं देखता हूं कि अगर युवा शक्ति कोई गाना बजा रही है तो हम लोगों में यह हिम्मत नहीं है कि हम रामायण या महाभारत देख सकें, क्योंकि हम युवाओं की ताकत समझते हैं। उनकी आवश्यकता और उपयोगिता भी समझते हैं। लेकिन आमतौर पर ऐसा नहीं होता कि युवा अपने को शक्तिशाली सिद्ध करने का प्रयास करते हों, भले ही हम उन्हें शक्तिशाली मानते रहे। यह पहली बार है कि युवाओं ने जंतर-मंतर पर आकर नारे लगाकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि हम शक्तिशाली हैं और समाज को हमारी शक्ति पहचाननी ही होगी। जैन जी की संख्या पूरी आबादी की एक तिहाई है, लेकिन इसके बाद भी जैन जी की ताकत हम दो तिहाई लोग हमेशा समझते भी हैं, महसूस भी करते हैं। इसके बाद भी जैन जी को अगर जंतर-मंतर पर आकर इस तरह के नारे लगाने पड़े, तो यह हमारी गलती थी या जैन जी की उद्दंडता, इस बात पर विचार करना पड़ेगा। मुख्य बात यह भी है कि कम्युनिस्ट के प्रभाव में आकर जैन जी ने जंतर-मंतर पर जिस तरह की युवा संस्कृति का उदाहरण प्रस्तुत किया, वह हम सबके लिए बहुत चिंता की बात है। यह आंदोलन सिर्फ युवा शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि युवा संस्कृति का भी प्रदर्शन था। जिस तरह से वहां गंदा सांस्कृतिक वातावरण बनाया गया और जैन जी के नेताओं ने उसका आनंद लिया, वह एक चिंता की बात है। आंदोलन समाप्त करने के बाद जिस तरह उनके नेताओं ने यह नारा लगाया कि "झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए", इस नारे ने भी हम सबके समक्ष एक चिंता पैदा कर दी है, क्योंकि हम दो तिहाई होते हुए भी हमेशा झुके हुए रहे हैं और हमारे बच्चे हमारे सामने आकर यह कहें कि "झुकते हैं बूढ़े, झुकाने वाला चाहिए", इससे एक चिंता का वातावरण पैदा हुआ है। यह सिर्फ हम सबके लिए ही सोचने का विषय नहीं है, बल्कि देश के जैन जी और युवाओं के भी सोचने का विषय है।

मैंने बार-बार लिखा कि दुनिया में कम्युनिस्ट ही सबसे अधिक चालाक माने जाते हैं और सबसे अधिक नासमझ यदि कोई माने जाते हैं, तो वह हमारे कुछ स्वर्ण साथी हैं। जंतर-मंतर में जो कुछ भी हुआ, उसमें हमें सिर झुकाकर मजबूरी में उनके दबाव के सामने झुकना पड़ा, क्योंकि हमारे ही कुछ नासमझ लोगों की गलती के कारण यह परिस्थितियां पैदा हुईं। ज्यादा समय नहीं बीता है। लगभग 6 महीने पहले ही इस सारी घटना की पटकथा लिखी जा चुकी थी। उस समय कम्युनिस्टों ने दलित नेताओं के साथ मिलकर यूजीसी का एक ऐसा कानून बनवा लिया था, जिसके कारण धर्मेंद्र प्रधान कटघरे में खड़े हो गए थे। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत उस कानून को रोक दिया, लेकिन हमारे तथाकथित मुट्ठी भर सवर्ण उस बात को इतना बतंगड़ बनाना चाहते थे कि बस सारी दुनिया को ही उलट देंगे। ये तो अब तुरंत ही आरक्षण खत्म कर देंगे। यह नरेंद्र मोदी, मोहन भागवत और संघ के लिए भी भद्दे शब्दों का उपयोग करते थे। मैंने कई बार समझाने का प्रयास किया कि यह समय जातिवाद के आधार पर समाज के विभाजन का नहीं है, लेकिन यह तो इतना उछल रहे थे कि किसी की सुनने को तैयार नहीं थे। कम्युनिस्टों ने मौका पाया और मौका पाकर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को भी निशाना बनाया और हम लोगों को भी निशाना बनाया। जंतर-मंतर में कुछ मुट्ठी भर कम्युनिस्ट और दलितों ने जिस तरह से राम को गालियां दीं, जिस तरह मनुस्मृति के लिए शब्दों का प्रयोग किया, जिस तरह वहां अंबेडकर के नारे लगे, उन्होंने सवर्णों की एक इज्जत नहीं छोड़ी और हमारे सब लोग सिर झुकाकर सुनते रहे, क्योंकि युधिष्ठिर जुए में हार चुके थे और हम सारी ताकत रहते हुए भी दुर्योधन की गालियां सुनने के लिए मजबूर थे। हम लोगों ने धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मजबूरी में लिया है और यदि ऐसी स्थिति में राहुल गांधी भी उनके साथ हो गए होते, तो शायद यह भी संभव था कि पूरी संसद संकट में आ जाती। इसीलिए बड़े-बुजुर्गों ने यह कहा है कि मूर्ख मित्र की अपेक्षा धूर्त विद्वान अधिक अच्छा होता है, यद्यपि मैं इस बात से सहमत नहीं हूं। फिर भी मैं अपने स्वर्ण साथियों से यह कहना चाहता हूं कि आप स्वर्ण-अवर्ण की लड़ाई नहीं, सर्वजाति समूह को इकट्ठा होने दीजिए। अब आप यह सपना छोड़ दीजिए कि हमने हजारों वर्षों तक दलितों को दबाकर रखा था, अब तो बराबरी का व्यवहार करना ही होगा, चाहे राजी या बेराजी। आप मुट्ठी भर स्वर्णों की मूर्खता ने हमारे आरक्षण-विरोधी अभियान को भी बहुत नुकसान पहुंचाया है। हम प्रारंभ से ही योग्यता को सफलता का आधार मानते रहे हैं, लेकिन आपकी जल्दबाजी ने हमारा नुकसान किया है। मैंने इस संबंध में अपने मित्रों को वस्तुस्थिति बताई है। आपकी गलतियों के कारण पूरे समाज को नीचा देखना पड़ता है।