राजनीतिक व्यवस्था से सामाजिक स्वशासन की ओर

3 अगस्त प्रातःकालीन सत्र।

अनुभव बताता है कि दुनिया की राजनीतिक व्यवस्था या तो गलत दिशा में जा रही है या अपर्याप्त है। लेकिन यदि हम भारत पर भी विचार करें, तो भारत में भी राजनीतिक सक्रियता के पूरे परिणाम बहुत बुरे निकल रहे हैं।

ऐसी स्थिति में अब हम लोगों की यह मजबूरी हो गई है कि हम राजनीतिक व्यवस्था को इस बात के लिए सहमत या बाध्य करें कि वह अपना हस्तक्षेप सामाजिक व्यवस्था में कम करे और समाज व्यवस्था को सशक्त होने दे। क्योंकि राजनीति के भरोसे समाज नहीं चल सकता और ऐसी स्थिति में समाज को हस्तक्षेप करना ही चाहिए।

स्वतंत्रता के बाद अब तक जो भी परिणाम दिख रहे हैं, वे असंतोषजनक हैं और भविष्य के लिए भी राजनीति से कोई अच्छी संभावना नहीं दिख रही है। या तो राजनीति यथास्थिति बनाए रखेगी अथवा और भी बुरे परिणाम दे सकती है।

इसलिए हम लोगों ने यह नया निर्णय किया है। हम पूरी तरह राजनीतिक व्यवस्था को अपने हाथ में लेने के लिए तैयार हैं। अब राजनेता यह बहानेबाजी छोड़ दें कि समाज अक्षम है, अपढ़ है, अयोग्य है। पढ़े-लिखे लोगों को जिम्मेदारी देकर हमने जो परिणाम देखा है, वह भी हमारे सामने आ चुका है।

इसलिए हम भले ही अपढ़ हों, अयोग्य हों, अक्षम हों, लेकिन अब हमें किसी कस्टोडियन की जरूरत नहीं है। हमें किसी मालिक की जरूरत नहीं है। हम अपना निर्णय स्वयं करने की तैयारी कर रहे हैं। हम लोगों ने यह तैयारी शुरू भी कर दी है और हम राज्य को इसके लिए सलाह दे रहे हैं कि वह आराम से, शांतिपूर्वक अपनी जिम्मेदारियाँ समाज को दे दे।