कमजोर होती परिवार व्यवस्था और बढ़ती आक्रामकता
6 अगस्त प्रातः कालीन सत्र। हम वर्तमान भारत में यह बढ़ती हुई प्रवृत्ति देख रहे हैं कि भौतिक उन्नति भी हो रही है, शिक्षा का विस्तार भी हो रहा है, सुविधाएँ भी बढ़ रही हैं। इसके बाद भी समाज में आत्महत्याएँ बढ़ रही हैं, आपस में हिंसा बढ़ रही है, सहनशक्ति आम लोगों की घट रही है। यह एक गंभीर समस्या है। भौतिक उन्नति और शिक्षा इसमें कोई समाधान देने में सक्षम नहीं है, क्योंकि यह अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक और मानसिक समस्या है। इस समस्या के बढ़ने का मुख्य कारण यह है कि परिवार व्यवस्था कमजोर हो रही है। परिवार में जो नए बच्चे हैं, वे अनुभव में कमजोर हैं, लेकिन प्रचार तंत्र के माध्यम से वे अपने को बहुत अधिक अनुभवी मानने लगे हैं। इसी तरह महिला सशक्तीकरण के नारे ने भी परिवार व्यवस्था को कमजोर किया है और इन दोनों के कारण आक्रामकता भी बढ़ रही है और आत्महत्या भी बढ़ रही है। वर्तमान समय में इन दोनों पीढ़ियों में महत्वाकांक्षाएँ बहुत अधिक हो गई हैं और जब उनकी महत्वाकांक्षा पूरी नहीं होती है, तब या तो वे निराश होकर आत्महत्या करते हैं अथवा समाज को दोषी मानकर आक्रामक हो जाते हैं। प्रयत्न और महत्वाकांक्षा के बीच संतुलन होना चाहिए, लेकिन वह संतुलन नहीं हो पा रहा है। इसका दोष नई पीढ़ी पर है, महिलाओं पर है अथवा हम बुजुर्गों का है, क्योंकि कहीं न कहीं हम लोगों से भी ऐसी गलतियाँ हो रही हैं, जिन गलतियों के कारण हमारी नई पीढ़ी अनुभवहीन बन जा रही है। यदि हमारे बच्चे गलत हैं तो हम बच्चों को दोष देकर ही अपने को निर्दोष सिद्ध करने की गलती न करें। हम स्वयं भी सोचें, क्या हमने अपने बच्चों और महिलाओं के साथ परस्पर उचित संवाद किया और यदि नहीं किया, गलती किसकी है। अब समय आ गया है कि हम आदेश देने की तुलना में मिल-बैठकर निर्णय करने की आदत डालें।
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