विचार मंथन का घटता महत्व और बढ़ता विचार प्रचार
9 अगस्त प्रातः कालीन सत्र। समाज के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि समाज में विचार मंथन लगातार कम होता जा रहा है। निष्कर्ष विचार प्रचार से प्रभावित होकर निकाले जा रहे हैं। हमारी विधायिका में तो विचार मंथन कभी होता ही नहीं है। वहाँ तो जो कुछ भी होता है, वह विचार प्रचार से प्रभावित होता है। अब न्यायपालिका भी धीरे-धीरे प्रचार से प्रभावित हो रही है। वहाँ भी विचार मंथन कम होता जा रहा है। पुराने जमाने में एक प्रणाली थी, जिसमें एक समूह विशेष को विचार मंथन की जिम्मेदारी दी जाती थी। शेष समाज उस विचार मंथन को फॉलो करता था, लेकिन वर्तमान समय में सामाजिक बुराई आने के कारण वह वर्ग भी विचार मंथन से पूरी तरह दूर हो गया है। यही कारण है कि अब हम विचार मंथन की प्रक्रिया को निरंतर आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। दुनिया भर में विचार प्रचार के अनेक तरीके बने हुए हैं। उसके लिए मीडिया है, उसके लिए सोशल मीडिया है, अन्य भी कई माध्यम हैं, जो सिर्फ विचार प्रचार पर ही निर्भर हैं। हमारे सामने विचार प्रचार को चुनौती देना एक बहुत ही दुष्कर कार्य दिखता है, लेकिन इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग भी नहीं है। इसीलिए हम लोगों ने मार्गदर्शक नामक एक विचार मंथन समूह बनाना शुरू किया है। मार्गदर्शक भी एक परीक्षा के बाद ही घोषित किए जा रहे हैं, क्योंकि विचार मंथन के अभाव में हम पूरी तरह नुकसान में रहेंगे। हम लोगों का प्रयत्न लगातार सफल हो रहा है। यह टीम प्रतिदिन रात को 7:30 बजे से 9:00 बजे तक विचार मंथन का अभ्यास करती है। मुझे पूरा विश्वास है कि हम लोग कुछ वर्षों में ही विचार प्रचार के महत्व को बहुत कम कर देंगे और विचार मंथन का महत्व बढ़ जाएगा।
Comments