एक समय था जब भारत में शंकराचार्य को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था। लेकिन
एक समय था जब भारत में शंकराचार्य को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था। लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियाँ बदलती गईं और आज शंकराचार्य का वह स्थान नहीं रह गया है, जैसा कुछ लोग अब भी मानते हैं।
मैंने स्वयं भी शंकराचार्य पद को कभी बहुत अधिक महत्व नहीं दिया, क्योंकि इस पद पर नियुक्ति किसी कठिन या पारदर्शी परीक्षा के बाद नहीं होती। इसी कारण आज शंकराचार्य को पूरे हिंदू समाज का सार्वभौमिक प्रवक्ता भी नहीं माना जाता।
मेरे अवलोकन के अनुसार वर्तमान समय में कई लोकप्रिय धार्मिक प्रवचनकर्ता—जैसे बागेश्वर बाबा या अन्य प्रचारक—जनसमर्थन और लोकप्रियता के मामले में कई बार शंकराचार्यों से अधिक प्रभावशाली दिखाई देते हैं। यदि कहीं इस प्रकार के धर्मगुरु प्रवचन करते हैं, तो कई बार उन्हें शंकराचार्य की तुलना में अधिक महत्व दिया जाता है।
आज के भारत में कुछ वैचारिक या सामाजिक संगठनों के नेता भी व्यापक प्रभाव रखते हैं। उदाहरण के लिए, कई लोग मानते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का सार्वजनिक प्रभाव कई मामलों में शंकराचार्यों से अधिक दिखाई देता है। इसका एक कारण यह भी है कि शंकराचार्य की भूमिका अब अधिकतर परंपरागत मान्यता तक सीमित रह गई है, जबकि सक्रिय सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप बहुत कम दिखाई देता है।
शायद यही कारण है कि हाल में मुक्तेश्वर आनंद पर लगे आरोपों से बहुत बड़ी हलचल नहीं हुई। एक तो ऐसे आरोप असाधारण नहीं माने जाते, और दूसरा यह कि आज शंकराचार्य पद का सामाजिक प्रभाव पहले जैसा व्यापक नहीं रहा है।
मेरे विचार से ऐसे आरोप सामने आने पर मुक्तेश्वर आनंद जी को शंकराचार्य पद से स्वयं हट जाने पर विचार करना चाहिए था। साथ ही यह भी संभव है कि यह एक मानवीय कमजोरी का मामला हो, या यह भी संभव है कि उन्हें किसी षड्यंत्र के तहत झूठे आरोपों में फँसाया गया हो। सच क्या है और झूठ क्या है, इस पर अंतिम निष्कर्ष न्यायिक या तथ्यात्मक जाँच के बाद ही निकल सकता है।
फिर भी इतना स्पष्ट है कि इस घटना से हिंदू धर्म को कोई बुनियादी नुकसान नहीं हुआ है। चाहे वे शंकराचार्य पद पर बने रहें या न रहें, यह एक व्यक्ति से जुड़ा मामला है; पूरे धर्म या समाज को इसके कारण शर्मिंदा होने की आवश्यकता नहीं है।
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