नक्सलवाद मैदान से विचारों में नहीं आया, विचारों से मैदान में उतरा था
कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से दिमागी नक्सलियों पर कुछ चर्चा की थी। इस विषय पर कई लोगों ने विस्तार से कुछ लिखा है। मेरे एक अच्छे मित्र प्रेम कुमार मणि ने बहुत शालीन भाषा में दिमागी नक्सलियों के पक्ष में यह प्रश्न खड़ा किया है कि आपने वनांचलों से भौतिक नक्सलियों को तो मार दिया, लेकिन अब वह नक्सलवाद वैचारिक धरातल पर आ चुका है, आप इसे कैसे समाप्त करेंगे?
मेरे विचार से उन्होंने जो कहा, वह उल्टा कहा। नक्सलवाद पहले वैचारिक धरातल पर आया और उसके बाद वह मैदान में आया था। मैदान से विचारों में नहीं गया है। इसलिए मोदी जी का यह कहना है कि हमने मैदान से तो नक्सलवाद को खत्म कर दिया, लेकिन अभी तक दिमागी स्तर पर नक्सलवाद बचा हुआ है।
मेरे विचार में मोदी जी के कहने का आशय यह भी हो सकता है कि पहले लोग सरकार को ब्लैकमेल करने के लिए आंदोलन करते थे, लेकिन इस बार का जो आंदोलन था, वह तख्तापलट के लिए था। वह ब्लैकमेल करने तक सीमित नहीं था। क्योंकि जब संविधान पर विश्वास न रहे, संसद पर विश्वास न रहे, चुनाव पर विश्वास न रहे, तभी कोई नक्सली दिमाग सड़क पर उतरता है। इस आंदोलन में कोई नक्सली दिमाग लगा हुआ था। यह छात्रों का आंदोलन नहीं था, छात्रों का तो उपयोग किया गया। तो उस नक्सली दिमाग को हमें खोजना पड़ेगा। अनुमान भी लगा चुका है, लेकिन इस संबंध में सरकार सावधान है।
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