सत्ता का असली बोझ: संख्या नहीं, केंद्रीकरण और विशेषाधिकार

हमारे कुछ मित्र इस तरह की सलाह देते हैं कि वर्तमान भारत में जितने सांसद-विधायक हैं, वही अधिक हैं। ये सारे देश को लूट रहे हैं; इनमें और संख्या बढ़ाना घातक होगा।

मेरे विचार से मैं इस पक्ष में नहीं हूँ। मैं इस मत का हूँ कि सांसदों-विधायकों की संख्या कई गुना बढ़ा दी जाए और उनका वेतन-भत्ता कम कर दिया जाए। उनके पावर कम कर दिए जाएँ, क्योंकि देश पर बोझ सांसदों और विधायकों की संख्या नहीं है, बल्कि उनका खर्चा और उनका पावर है।

इसलिए मैं सत्ता के विकेंद्रीकरण का पक्षधर हूँ, केंद्रीकरण का नहीं। इसलिए मैं सांसदों की संख्या वृद्धि का समर्थन करता हूँ। मेरा यह सुझाव है कि हर परिवार का अपना एक संविधान हो, हर परिवार का अपना एक प्रधानमंत्री हो। हर ग्राम सभा एक संसद हो। वर्तमान सांसद के पावर बहुत कम हो जाएँ। संसद के समानांतर एक संविधान सभा भी बन जाए।

सबके वेतन-भत्ते या तो बंद कर दिए जाएँ या कम कर दिए जाएँ, तो व्यवस्था बहुत सुधर जाएगी।