रामानुजगंज से नक्सलवाद के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत: एक व्यक्तिगत अनुभव
भारत के प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद पर कुछ टिप्पणी की थी। इसके विरोध में चिदंबरम, अरविंद केजरीवाल, महबूबा मुफ्ती नक्सलवाद के समर्थन में सामने आ गए। मैंने भी नक्सलवाद को बहुत नजदीक से अनुभव किया है। शायद भारत में इतना प्रत्यक्ष अनुभव और किसी को न हो। इसके लिए आप 1997 से 2005 तक के इतिहास में जा सकते हैं।
उस कालखंड तक हमारे जिले में नक्सलवाद आया ही नहीं था, लेकिन मैं नक्सलवाद को व्यवस्था परिवर्तन समझता था, क्योंकि गांधीवादियों से मैं यही समझा था। यहां तक कि मध्य प्रदेश सरकार ने मुझे नक्सलवादी घोषित करके गोली मारने का भी आदेश दिया था, जिसमें गांधीवादियों ने मुझे बचा लिया। फिर जबलपुर उच्च न्यायालय ने भी मेरी रक्षा की।
दो-तीन वर्षों के बाद हमारे जिले में झारखंड से नक्सलवाद आ गया और हमारा पूरा जिला नक्सलवादी हो गया। तब मैंने नक्सलवाद को नजदीक से देखा और समझा कि नक्सलवाद व्यवस्था परिवर्तन नहीं है, हिंसक सत्ता संघर्ष है। और मैंने नक्सलवाद को समाप्त करने का बीड़ा उठा लिया। 2005 आते-आते तक हमारा जिला नक्सलवाद की समाप्ति में सफल हो गया।
मैं यह कह सकता हूं कि नक्सलवाद के समापन का सबसे पहला प्रयोग हमारे बलरामपुर-रामानुजगंज जिले से हुआ है और बाद में यह बढ़ता चला गया। इस पूरी घटना पर एक राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार राकेश कुमार ने कई दिन रामानुजगंज में रहकर रिसर्च करके अखबारों में प्रकाशित भी किया है।
इस तरह मैं चिदंबरम, केजरीवाल और महबूबा मुफ्ती को बताना चाहता हूं कि नक्सलवाद बहुत खतरनाक सच है और इन तीनों को ऐसी मूर्खता नहीं करनी चाहिए।
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