छत्तीसगढ़ से संसद तक: जनहित और प्रोटोकॉल का महत्वपूर्ण प्रश्न

छत्तीसगढ़ के रायपुर शहर में हमारे तेज-तर्रार सांसद बृजमोहन अग्रवाल जनहित के लिए निरंतर सक्रिय रहते हैं। उन्हें आम जनता में इसीलिए बहुत प्रेम और समर्थन मिलता है। वह जनहित में सिस्टम की परवाह नहीं करते और स्वयं उसमें सक्रिय हो जाते हैं। एक दूसरे प्रशासनिक अधिकारी हैं अमित कटारिया। वे सिस्टम से हटकर कोई भी कार्य नहीं करते, किसी का दबाव बर्दाश्त नहीं करते। दबाव पड़ने पर वे कटु व्यवहार भी करने के लिए प्रसिद्ध माने जाते हैं। वर्तमान में स्वास्थ्य सचिव बताए जाते हैं। इन दोनों के बीच में अपनी-अपनी योग्यता के आधार पर टकराव हुआ। बृजमोहन अग्रवाल ने सांसद होने के नाते किसी कार्य को करने का दबाव डाला, जो जनहित में था। अमित कटारिया ने कार्य करना अस्वीकार कर दिया क्योंकि वह नियम-विरुद्ध था और इसी मामले में दोनों की कुछ बात हुई है, जो मामला संसद तक गया है। मैं भी इस विषय पर विचार किया और मेरा भी यह मानना है कि अमित कटारिया ने जो कुछ किया, वह बृजमोहन अग्रवाल की तुलना में अधिक न्यायसंगत है। एक पिता अगर कलेक्टर के ऑफिस में जाता है तो उसे अपने पुत्र के कहने के बाद ही कुर्सी पर बैठना चाहिए। यही प्रोटोकॉल है। और जब वह कलेक्टर अपने घर जाता है तो पिता के कहने के बाद ही कुर्सी पर बैठना चाहिए क्योंकि वहाँ पिता का प्रोटोकॉल लागू होता है। बृजमोहन अग्रवाल को भी कार्यपालिका के प्रोटोकॉल का सम्मान करने की आदत डालनी चाहिए। जनहित की क्रियान्विति व्यवस्था के माध्यम से ही संभव है, व्यवस्था को तोड़कर नहीं।