पुणे में मनुस्मृति पर प्रहार: राहुल गांधी किस परिवार-व्यवस्था के पक्षधर हैं?

हम वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिवेश को दो संस्कृतियों के बीच टकराव के रूप में देख रहे हैं। एक संस्कृति का नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे हैं जिनके पीछे कम्युनिस्ट, मुसलमान और कुछ अंबेडकरवादी कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। दूसरी संस्कृति का नेतृत्व नरेंद्र मोदी, मोहन भागवत, योगी आदित्यनाथ तथा हम लोग कर रहे हैं।

परसों पुणे में राहुल गांधी ने अपनी संस्कृति के अनुरूप मनुस्मृति की बहुत आलोचना की। उन्होंने यह बात साफ की कि अब महिलाओं को स्वयं को महिला नहीं, स्वतंत्र व्यक्ति समझना चाहिए, वे परिवार के बंधन में रहने के लिए बाध्य नहीं हैं। जबकि मनुस्मृति महिलाओं को परिवार की बंधक मानती है। हमारी संस्कृति यह कहती है कि महिलाओं को भी स्वयं को परिवार का सदस्य मानना चाहिए — वे मां, बेटी या बहन के रूप में परिवार में रह सकती हैं। महिला को परिवार छोड़ने की स्वतंत्रता है, लेकिन परिवार में रहते हुए वह स्वयं को केवल स्वतंत्र इकाई नहीं मान सकती। मनुस्मृति यह भी आदेश देती है कि महिलाओं की रक्षा करना भाई, पति और पिता का सर्वोच्च दायित्व है, और पुरुषों की जिम्मेदारी है कि वे महिलाओं की सुरक्षा करें जबकि महिलाओं की जिम्मेदारी है कि वे पुरुषों के साथ परिवार में सहभागी की भूमिका निभाएं।

हमारी दोनों संस्कृतियों के बीच यही मूल टकराव है — हम परिवार और समाज-व्यवस्था को व्यक्ति से ऊपर मानते हैं, और हमारा विरोधी पक्ष व्यक्ति को पारिवारिक और सामाजिक अनुशासन से मुक्त मानता है। मनुस्मृति पुरुषों को निर्देश देती है — "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" — और महिलाओं को निर्देश देती है कि पति भगवान-स्वरूप है। हम वर्ग-संघर्ष नहीं, वर्ग-समन्वय के पक्षधर हैं; विपक्ष समन्वय का नहीं, संघर्ष का पक्षधर है। हम गांधी के विचारों को मानने वाले हैं, विपक्ष गांधी के नाम की दुकानदारी करना जानता है। हमें मनुस्मृति के इस पारिवारिक संदेश पर गर्व है, जिसे राहुल निंदक समझ रहे हैं।

मेरा भी अपना परिवार है — मेरे परिवार में अभी सातवीं पीढ़ी चल रही है, इस तरह मैंने छह पीढ़ियां देखी हैं। हमारे परिवार में महिलाओं और बच्चों को अधिकतम स्वतंत्रता है, और वे परिवार के अनुशासन को पूरी तरह स्वीकार भी करते हैं — क्योंकि हम राहुल गांधी जैसे लोगों से बहुत दूरी बनाकर रखते हैं। एक दूसरा परिवार भी हमारे सामने उदाहरण स्वरूप है — नेहरू परिवार। नेहरू से लेकर राहुल, प्रियंका और बच्चों तक छह-सात पीढ़ियां आज़ादी के बाद गुज़री हैं। वहां महिलाओं और बच्चों की स्वतंत्रता तो दिखी है, लेकिन नेहरू से वर्तमान तक जितना गंदा उदाहरण परिवार-व्यवस्था का दिखाई देता है, उसे हम हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं।

हमें कभी गांधी नाम की नकल करने की ज़रूरत नहीं पड़ी। हम सात पीढ़ियों से अग्रवाल नाम से जी रहे हैं। हमने गरीबी भी देखी है, अमीरी भी, लेकिन नेहरू परिवार ने सत्ता की ब्लैकमेलिंग के अतिरिक्त अपने जीवन में कुछ नहीं देखा है। कल राहुल गांधी ने पुणे में जो भाषण दिया, वह अपनी योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि सोनिया गांधी के गर्भ से पैदा होने के कारण दिया — अन्यथा राहुल जैसे कितने ही लोग विपक्ष का नेता बनने को तैयार खड़े हैं, पर वे सोनिया के गर्भ से पैदा नहीं हुए।

मेरा मानना है कि राहुल गांधी को अपने कम्युनिस्ट और अंबेडकरवादी मित्रों को खुश करने के लिए मनुस्मृति की यह गलत आलोचना नहीं करनी चाहिए थी, क्योंकि हम अपनी पारिवारिक व्यवस्था में मनुस्मृति के अनुसार स्वतंत्रता और सहजीवन का तालमेल बनाकर रखना जानते हैं। हमें गर्व है कि हम राहुल गांधी को आदर्श परिवार समझाने की क्षमता रखते हैं। मेरा राहुल गांधी से निवेदन है कि वे परिवार-व्यवस्था तोड़ने के अपने अभियान पर फिर से विचार करें — अन्यथा अपने नाम के साथ "गांधी" लगाना छोड़ दें।