बेरोजगारी की गलत परिभाषा बदलने की जरूरत

9 सितंबर प्रातःकालीन सत्र। दुनिया में अनेक गलत परिभाषाएँ बनी हुई हैं और उन परिभाषाओं के आधार को दुनिया सच मानकर चल रही है, जबकि ये गलत परिभाषाएँ ही समस्याओं को बढ़ाती हैं। ऐसी ही एक परिभाषा पढ़ी हुई है बेरोजगारी की। बेरोजगारी एक सापेक्ष शब्द है, निरपेक्ष शब्द नहीं। हर इकाई, चाहे वह परिवार हो अथवा देश, अपने-अपने परिस्थितियों के अनुसार बेरोजगारी का आकलन करते हैं और वही बेरोजगारी की सही परिभाषा होती है।

बेरोजगारी दूर करना किसी इकाई का दायित्व नहीं होता है, सिर्फ कर्तव्य होता है, लेकिन दुर्भाग्य से इसे दायित्व समझ लिया जाता है। बेरोजगारी में गुजारा भत्ता दिया जाता है, वह गुजारा भत्ता भी प्राप्तकर्ता का अधिकार नहीं होता, दाता का कर्तव्य होता है।

भारत में बेरोजगारी बिल्कुल नहीं है। लोगों का जीवन स्तर बहुत तेजी से ऊपर जा रहा है। आमतौर पर श्रम करने के लिए लोग मिल नहीं रहे हैं, मजदूरी करने वालों का अभाव हो गया है, क्योंकि बौद्धिक स्तर की सुविधा लगातार बढ़ रही है। इसका महत्वपूर्ण कारण यही है कि हमने बेरोजगारी की गलत परिभाषा बनाई है। बेरोजगारी का आकलन श्रम मूल्य के साथ ही होना चाहिए। कोई शिक्षित बेरोजगार होता ही नहीं है।

मेरा यह सुझाव है कि भारतीय समाज अब दुनिया की बेरोजगारी की परिभाषा की नकल करना बंद कर दे। अपनी एक आंतरिक परिभाषा बनाकर उस परिभाषा को विकसित करें। यदि वह परिभाषा सफल हो जाएगी, दुनिया अपनी परिभाषा में संशोधन भी कर सकती है। परिभाषा में बदलाव के लिए हमें भारत से पहल करनी चाहिए।