व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ व्यवस्था का सुधार है
14 सितंबर प्रातः कालीन सत्र। वर्तमान समय में राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक समस्याएँ इतनी विकृत हो गई हैं कि इन व्यवस्थाओं में सुधार बहुत कठिन कार्य है। यही मानकर हम व्यवस्था परिवर्तन का संदेश दे रहे हैं। एक ऐसी साफ-सुथरी व्यवस्था, जिसमें धार्मिक, संवैधानिक, आर्थिक, सामाजिक सब प्रकार की वर्तमान समस्याओं से मुक्त हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम कोई नई व्यवस्था दे रहे हैं। वर्तमान व्यवस्था में जो गड़बड़ियाँ हैं, उन गड़बड़ियों से मुक्त व्यवस्था को ही हम नई व्यवस्था मान रहे हैं। व्यवस्था परिवर्तन का मतलब कोई नई व्यवस्था नहीं है, बल्कि वर्तमान व्यवस्थाओं का सुधरा हुआ स्वरूप है।
हम वर्तमान विकृत लोकतंत्र की जगह लोक स्वराज का संदेश दे रहे हैं। हम वर्तमान विकृत वर्ण व्यवस्था की जगह एक सुधरी हुई वर्ण व्यवस्था का प्रस्ताव दे रहे हैं। इस सुधरी हुई वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, ये चार नाम सिर्फ बदले गए हैं। हमने मार्गदर्शक, रक्षक, पालक और सेवक कर दिया है। शेष सब वही है, हमने कुछ भी नहीं बदला है। जो पुरानी व्यवस्था थी, वही व्यवस्था रहेगी, लेकिन सिर्फ एक बदलाव होगा कि जन्म के अनुसार वर्ण नहीं, कर्म और योग्यता के अनुसार वर्ण और जातियाँ बनेगी। बस यह छोटा-सा बदलाव हम कर रहे हैं।
हम उम्मीद करते हैं कि मार्गदर्शक, रक्षक, पालक, सेवक नाम आपको पसंद आएंगे। आप हमारे इस व्यवस्था परिवर्तन अभियान से जुड़कर इसे आगे बढ़ा सकते हैं।
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