जातीय आरक्षण और विशेष अधिकार का अंतर
जातीय आरक्षण का पक्ष और विरोध लगातार तेज होता जा रहा है, लेकिन इस मामले में और अधिक गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। आरक्षण का मामला सिर्फ जातीय आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मामला दो प्रकार से संचालित होता है। एक है जाति आरक्षण और दूसरा है जातीय विशेष अधिकार।
जातीय आरक्षण कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं है। उससे आमतौर पर सवर्ण अधिक आतंकित नहीं है, लेकिन जातीय विशेष अधिकार एक बहुत बड़ी समस्या है। वर्तमान समय में छुआछूत भी घट रही है, जाति भेदभाव भी घट रहा है, किंतु जाति के नाम पर दलित और आदिवासियों के दो प्रतिशत धूर्तों का अत्याचार बढ़ रहा है। यह विशेष अधिकार इस समस्या को कई गुना अधिक विकट बना रहा है, क्योंकि इस प्रकार के आरोप लगाते ही आरोप लगाने वाले को आर्थिक सहायता भी मिल जाती है, वह कुछ जातियों में हीरो बन जाता है, उसकी ब्लैकमेलिंग क्षमता बढ़ जाती है और उसका परिणाम होता है शरीफ सवर्ण का शोषण। उसका परिणाम होता है सवर्ण के अंदर आक्रोश।
मेरे विचार से इसका बहुत आसान समाधान हो सकता है कि आप जातीय विशेष अधिकार को सामान्यतः समाप्त कर दीजिए। कोई विरले मामलों में ही इस मामले में कार्यवाही हो। साथ ही, आप जाति आरक्षण को इसी तरह रहने दीजिए। विरले मामलों में ही जाति आरक्षण को समाप्त किया जाए।
स्पष्ट है कि एक आर्थिक सीमा-रेखा बनाकर जाति आरक्षण को कायम रखा जाए और एक महत्वपूर्ण सीमा-रेखा बनाकर ही जातीय विशेष अधिकार को समाप्त कर दिया जाए।
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