गांधी, मदर टेरेसा और चंपत राय से सीख

15 सितंबर प्रातः कालीन सत्र। हम वर्तमान भारत में निस्वार्थ और विद्वान विचारकों के अभाव से जूझ रहे हैं। इसमें विचारकों की समस्या नहीं है, समस्या समाज में है। हम ऐसे विचारकों को उचित सम्मान भी नहीं देते, बल्कि ये पेशेवर राजनेता अथवा तथाकथित अन्य लोग ऐसे त्यागी तपस्वी लोगों का व्यक्तिगत अपमान करते हैं। तब ऐसे लोगों की प्रतिष्ठा भी कम हो जाती है।

हमने यह गलती गांधी से शुरू की थी। गांधी ज्ञान और त्याग के संग्रह थे। कभी कोई राजनीतिक पद या धन की इच्छा नहीं की, हमेशा समाज के कार्य में लगे रहे, लेकिन पदलोलुप भ्रष्ट राजनेताओं ने गांधी की व्यक्तिगत आलोचना करके सारी सीमाओं को तोड़ दिया।

हमने मदर टेरेसा को भी देखा है। उन्होंने भी कभी कोई इच्छा व्यक्त नहीं की। इसके बाद भी निकम्मे धर्मगुरुओं ने मदर टेरेसा की व्यक्तिगत आलोचना की।

वर्तमान समय में भी हम चंपत राय सरीखे एक महापुरुष को देख रहे हैं। उन्होंने ज्ञान और त्याग का एक संयुक्त उदाहरण प्रस्तुत किया, लेकिन ये दो कौड़ी के राजनेता और धर्मगुरुओं ने ऐसे त्यागी तपस्वी चंपत राय की व्यक्तिगत आलोचना की।

आप गंभीरता से विचार करिए कि एक तरफ मीडिया के नाम पर, राजनीति के नाम पर, खेलों के नाम पर शुद्ध व्यापार चल रहा है, दूसरी तरफ बिरले ही ऐसे लोग निकलते हैं जो किसी स्वार्थ के बिना अपना पूरा ज्ञान समाज को समर्पित कर देते हैं। ऐसे लोगों की यदि नीतियों की आलोचना होती है तो हमें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन यदि व्यक्तिगत आलोचना होती है तो हमें अवश्य आपत्ति है।

जिन लोगों ने चंपत राय की व्यक्तिगत आलोचना की, उन लोगों को समाज से माफी माँगनी चाहिए। खुद तो राजनीति सरीखे गंदे व्यापार में लगे हुए हैं और दूसरे त्यागी तपस्वी पर लांछन लगाते हैं। जिन लोगों ने गांधी, मदर टेरेसा या चंपत राय पर अनर्गल आरोप लगाए, इस प्रकार के लोगों की निंदा की जानी चाहिए।