भावना प्रधान समाज और सत्ता की राजनीति

भारत में लगभग 90% लोग भावना प्रधान होते हैं और केवल 10% लोग ही बुद्धि प्रधान होते हैं। ये 90% लोग न तो समस्याएँ पैदा करते हैं और न ही उनका समाधान कर पाते हैं। सामान्यतः समस्याएँ भी वही 10% लोग पैदा करते हैं और समाधान भी वही करते हैं। यही 10% लोग धीरे-धीरे 90% लोगों के संचालक बन जाते हैं।
दुर्भाग्य से वर्तमान समय में इन 10% लोगों में समस्याएँ पैदा करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वे हिंसा और स्वार्थ को हथियार बनाकर सब कुछ अपने लिए इकट्ठा करना चाहते हैं। यही 10% लोग राजनीति में सक्रिय रहते हैं और हमेशा 90% भावना प्रधान लोगों का उपयोग करना चाहते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि ये 90% लोग भावना प्रधान ही बने रहें और कभी समझदार न बनें।
इसी उद्देश्य से वे लगातार भावना प्रधान प्रवचन देते रहते हैं, क्योंकि जब तक 90% लोग भावना के आधार पर चलेंगे, तब तक ये 10% लोग उनका लाभ उठाते रहेंगे। वर्तमान भारत में राज्य लगभग बुद्धि प्रधान लोगों के हाथ में है, लेकिन राज्य निरंतर यह प्रयास करता है कि चर्चाएँ भावना प्रधान तरीके से ही होती रहें। चर्चाओं में न तर्क का प्रयोग हो, न बुद्धि का, और न ही उचित-अनुचित पर गंभीर विचार हो।
संसद में भी प्रायः बौद्धिक चर्चा नहीं होती, न ही गंभीर तर्क-वितर्क होता है। पक्ष और विपक्ष में संसद को बाँटकर वहाँ केवल नाटकबाजी चलती रहती है।
अब समय आ गया है कि हम सत्ता प्रतिष्ठान को वैचारिक चर्चा के लिए तैयार करें। समस्या बहुत बड़ी है और समाधान के अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है। हमें कहीं न कहीं से शुरुआत करनी ही होगी, और यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि इस कार्य की शुरुआत करें।
इस दिशा में पहला कदम यह होना चाहिए कि हम दलगत राजनीति से मुक्त राजनीतिक व्यवस्था की ओर आगे बढ़ें। हमें संविधान में ऐसा संशोधन करना चाहिए कि निर्वाचित व्यक्ति वास्तव में जनप्रतिनिधि हो, दल का प्रतिनिधि नहीं। संसद में चर्चा दलीय आधार पर नहीं, बल्कि यथार्थ और तर्क के आधार पर होनी चाहिए।
संसद में दल का गुलाम नहीं, बल्कि स्वतंत्र और उत्तरदायी जनप्रतिनिधि व्यवस्था होनी चाहिए।