प्रकृति का संतुलन: युद्ध और महामारी के पीछे छिपी शक्ति

ईश्वर सर्वशक्तिमान है अथवा प्रकृति सर्वशक्तिमान है—इस बहस में उलझने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन यह बात अवश्य समझ में आती है कि कोई न कोई शक्ति ऐसी है, जो स्वाभाविक रूप से समाज में संतुलन बनाती है।

कोरोना एक ऐसा ही संतुलनकारी परिणाम था, क्योंकि आज तक यह बात रहस्य ही बनी हुई है कि कोरोना कैसे शुरू हुआ और कैसे समाप्त हुआ। इसी तरह वर्तमान युद्ध क्यों हो रहा है, इस बात में अधिक उलझने की आवश्यकता नहीं है। वर्तमान युद्ध प्रकृति का एक प्रयोग है, क्योंकि दुनिया तेल की कीमत पर अपनी विकास दर बढ़ा रही थी। उसे न पर्यावरण की चिंता थी, न प्रकृति से कोई लेना-देना था, न ही श्रम के विषय में कोई गंभीर विचार था। केवल तेल को आधार बनाकर दुनिया अपने विकास का पैमाना निर्धारित कर रही थी।

दो तानाशाहों ने लड़कर प्रकृति का यह कार्य सफल कर दिया—ऐसा प्रतीत होता है। इसमें न अमेरिका की जनता लड़ रही है, न ईरान की जनता; लड़ रही है एक तरफ ट्रंप और दूसरी तरफ खामनेई की एक छोटी-सी तानाशाही टुकड़ी। ये दोनों लड़कर प्राकृतिक संतुलन बनाने का कार्य कर रहे हैं।

यह युद्ध कुछ दिन और चलना चाहिए, जिससे तेल पर निर्भरता घटे, श्रम का महत्व बढ़े और प्रकृति पर विश्वास बढ़े। ऐसा प्रतीत होता है कि दुनिया की विकास दर 2% घटेगी और भारत की विकास दर भी इसी अनुपात में दो प्रतिशत कम हो सकती है।

मैं इस युद्ध को भी प्रकृति द्वारा किए गए संतुलन के प्रयास के रूप में देखता हूँ। तेल में यदि पानी मिल गया हो, तो आग पर चढ़ते ही जब तक वह पानी जल नहीं जाता, तब तक तेल में उफान आता ही रहेगा। जितनी जल्दी वह पानी जल जाए, उतना ही दुनिया के लिए अच्छा है।