“माल महाराज का, मिर्जा खेले होली” — वर्तमान लोकतंत्र पर एक टिप्पणी

 

एक कहावत है — “माल महाराज का, मिर्जा खेले होली।” भारत का लोकतंत्र ठीक इसी कहावत को चरितार्थ कर रहा है। लोकतंत्र के चार स्तंभ — न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका तथा तथाकथित चौथा स्तंभ मीडिया — चारों लोक अर्थात भारत की जनता से मनमाना टैक्स वसूल कर उसका खुला दुरुपयोग कर रहे हैं, और इस दुरुपयोग का नाम ही भारत में लोकतंत्र बताया जा रहा है।

यदि हम न्यायपालिका की समीक्षा करें, तो न्यायालयों में पेशेवर मुकदमे लड़ने वालों की बाढ़ आई हुई है। अनेक ऐसे लोग आपको मिल जाएंगे, जिनका धंधा ही केस लड़ना है, और सामान्य लोग ऐसे मुकदमेबाज लोगों से डरते हैं। ये मुकदमेबाज लोग वकील, न्यायाधीश और कानून की जटिलताओं से तालमेल बिठाकर इसी का व्यापार करते हैं।

आप गंभीरता से विचार करिए कि हमारा सुप्रीम कोर्ट महीनों से इस बात पर लगातार विचार कर रहा है कि सबरीमला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश होना चाहिए या नहीं। अरे भाई, जो कार्य एक दिन में किया जा सकता है, उस कार्य के लिए तुम कई महीने लगा रहे हो और बिना मतलब सारे देश में चर्चा फैला रहे हो, जबकि यह मुद्दा बहुत साधारण है। कोई सामान्य व्यक्ति भी इसका निपटारा कर सकता है। लेकिन संविधान, कानून और न्यायालय — इन सबको उसमें मिलाकर तुमने एक ऐसी खिचड़ी तैयार कर दी है कि अनंत काल तक भारत की जनता का धन बर्बाद करने का एक अच्छा साधन मान लिया गया है।

मुझे आश्चर्य है कि इस प्रकार के खेल का न विधायिका विरोध कर पाती है, न कार्यपालिका विरोध कर पाती है, क्योंकि इस प्रकार के खेल में सबकी अपनी-अपनी हिस्सेदारी है।

आइए, हम सब मिल बैठकर इस लोकतंत्र का एक नया विकल्प तैयार करें। इस सड़ी-गली आयातित लोकतांत्रिक व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव ही मुक्ति का मार्ग है।