नार्वे की घटना ने मीडिया की भूमिका पर खड़ा किया बड़ा सवाल
Norway में मीडिया से जुड़े विवाद ने दुनिया के सामने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि लोकतंत्र में मीडिया कितने प्रतिशत व्यापार है और कितने प्रतिशत समाज सेवा। इस विषय पर मैंने भी गंभीरता से विचार किया है। मेरा मानना है कि राजनीति, एनजीओ और स्कूलों में जितना समाज सेवा का तत्व है और जितना व्यापार का तत्व है, लगभग वही स्थिति मीडिया की भी है।
नॉर्वे में मीडिया ने जिस प्रकार का व्यवहार किया, उस पर अधिक संयम और जिम्मेदारी अपेक्षित थी। भले ही Narendra Modi विदेश यात्रा पर होने के कारण शांत रहे, लेकिन यदि उनकी जगह Donald Trump होते, तो संभवतः उनकी प्रतिक्रिया अधिक कठोर होती।
अक्सर कहा जाता है कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। यह बात Norway या United Kingdom जैसे देशों में कही जाती है, लेकिन व्यवहारिक दृष्टि से मीडिया एक व्यापारिक व्यवस्था भी है। यह सत्य है कि कई बार राजनेता मीडिया से प्रभावित या भयभीत दिखाई देते हैं, उन्हें आर्थिक लाभ देते हैं या उनकी खुशामद करते हैं, लेकिन इससे मीडिया लोकतंत्र का औपचारिक चौथा स्तंभ नहीं बन जाता।
जिस प्रकार अन्य सभी व्यापार स्वतंत्र हैं, उसी प्रकार मीडिया को भी स्वतंत्र रहना चाहिए। परंतु जिस प्रकार अन्य व्यवसायों की उद्दंडता और अनुशासनहीनता पर नियंत्रण के नियम होते हैं, उसी प्रकार मीडिया की जवाबदेही भी सुनिश्चित होनी चाहिए। सरकार को न तो मीडिया से डरना चाहिए और न ही उसे अनावश्यक आर्थिक सहायता देकर निर्भर बनाना चाहिए। मीडिया एक स्वतंत्र व्यवसाय है और उसे स्वतंत्र ही रहना चाहिए।
नॉर्वे की इस घटना ने हमें यह अवसर दिया है कि हम लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया की जिम्मेदारियों पर गंभीरता से सामूहिक विचार करें।
Comments