नई समाज व्यवस्था और दहेज संबंधी मान्यताएँ
3 जून प्रातःकालीन सत्र
हम नई समाज व्यवस्था में दहेज के लेन-देन को पूरी तरह स्वैच्छिक कर देंगे। कानून में तो दहेज के लेन-देन पर किसी प्रकार का कोई नियंत्रण होगा ही नहीं, लेकिन सामाजिक व्यवस्था में भी हम दहेज के लेन-देन को पारिवारिक या आंतरिक विषय समझेंगे।
दहेज लेना-देना कोई बुराई नहीं है। दहेज का लेना-देना एक प्रकार की सामाजिक व्यवस्था है। गलत नीयत से कुछ लोगों ने इस व्यवस्था को बुराई के रूप में प्रस्तुत कर दिया। हम इसको बदल देंगे।
इतने कठोर कानूनों और सामाजिक संस्थाओं द्वारा दहेज के विरुद्ध लगातार प्रचार करने के बाद भी आज दहेज की व्यवस्था समाज में उसी तरह बनी हुई है, जिस तरह पहले थी, क्योंकि दहेज लेना-देना कभी भी व्यापक रूप से बुराई नहीं माना गया है।
आप उच्च सैद्धांतिक नियम बनाकर किसी व्यवहारिक अनिवार्यता को समाप्त नहीं कर सकते। यह संभव नहीं है। इसलिए मेरा मानना है कि दहेज के मामले में अब अपनी मान्यताएँ बदल देनी चाहिए।
मैंने अपने पूरे जीवन में दहेज लेने-देने को एक आंतरिक व्यवस्था माना, कभी बुराई के रूप में नहीं माना, और आज भी नहीं मानता हूँ।
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