संवैधानिक आपातकाल: इतिहास की चेतावनी, भविष्य का संकल्प
कल संवैधानिक आपातकाल की बरसी मनाकर आपातकाल को याद किया गया। मैं भी उसका भुक्तभोगी रहा हूं और मैं भी उस आपातकाल के विरोध में 18 महीने की आपातकालीन जेल में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैं इस मत का हूं कि किसी भी परिस्थिति में संवैधानिक आपातकाल का विरोध किया ही ज्यादा चाहिए। हम उस आपातकाल की बरसी मनाकर सारी दुनिया को यह आश्वस्त करना चाहते हैं अब किसी भी परिस्थिति में भारत में आपातकाल का ना समर्थन किया जाएगा और ना आपातकाल की परिस्थितियां पैदा होने दी जाएंगी। अब भारत में सब कुछ सामान्य चल रहा है। आपातकाल के समर्थक लोग धीरे-धीरे समाज से बहिष्कृत किए जा रहे हैं। अब संविधान का अक्षरशः पालन किया जा रहा है। न्यायपालिका भी स्वतंत्र हो रही है। विधायिका और कार्यपालिका भी स्वतंत्र हो रहे हैं बल्कि हम यह कह सकते हैं कि तीनों ही आंशिक रूप से उद्दंड हो रहे हैं। जिस तरह वर्तमान समय में राजनीतिक व्यवस्था संवैधानिक शासन को सशक्त कर रही है उस आधार पर यह कहा जा सकता है कि भविष्य में कभी आपातकाल की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। और ना ही आपातकाल का उपयोग किया जाएगा। जिन लोगों ने संवैधानिक आपातकाल का समर्थन किया था या लागू किया था आज वे लोग बहुत कष्ट में हैं। वे बहुत भयभीत हैं कि दो-तिहाई बहुमत लाकर वर्तमान व्यवस्था संवैधानिक तरीके से और शक्तिशाली ना हो जाए। वर्तमान परिस्थितियों को वे आपातकाल या अघोषित आपातकाल कहकर दिन-रात झूठ फैलाने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन अब समाज इतना परिपक्व हो गया है कि वह इन लोगों की बुरी नीयत को अच्छी तरह समझता है। इंदिरा के आपातकाल के समर्थक वर्तमान सरकार को कमजोर करने में पूरी तरह असफल सिद्ध होते जा रहे हैं और उन्हें किसी भी प्रकार का जनसमर्थन नहीं मिलना यह सिद्ध करता है कि भारत की जनता परिपक्व है। हमें किसी भी परिस्थिति में किसी भी प्रकार के आपातकाल का विरोध करना ही चाहिए। हम तानाशाही के विरुद्ध हैं और रहेंगे। हम तानाशाही के खिलाफ लोकतंत्र को स्वीकार कर सकते हैं तानाशाही को नहीं। हम लोकतंत्र के खिलाफ लोक स्वराज की दिशा में जन जागरण कर सकते हैं। हम संवैधानिक तरीके से संविधान में संशोधन कर सकते हैं बदलाव कर सकते हैं लेकिन हम असंवैधानिक तरीके से संविधान पर किसी तरह के नियंत्रण के विरुद्ध थे, हैं और रहेंगे।
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