डॉक्टर–नर्स प्रकरण: सहमति, ब्लैकमेल और कानून पर सवाल
राजस्थान के बाड़मेर में एक प्राइवेट अस्पताल के डॉक्टर ने अपनी ही नर्स के साथ एक बार शारीरिक संबंध बना लिए। डॉक्टर की पहल पर नर्स तैयार हुई या नर्स की पहल पर डॉक्टर, यह अलग जाँच का विषय है, लेकिन शारीरिक संबंध बनाने की घटना नर्स ने अपने मोबाइल पर रिकॉर्ड कर ली। हो सकता है कि आपसी सहमति से एक-दो बार और भी ऐसे संबंध बने हों, लेकिन उसके बाद ब्लैकमेलिंग का धंधा शुरू हो गया और करीब 2 वर्षों में ही नर्स ने उस डॉक्टर से पौने दो करोड़ रुपये ब्लैकमेल कर लिए। डॉक्टर परेशान हो गया और तब डॉक्टर ने थाने में रिपोर्ट की। उस महिला को गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन आप सोचिए कि यदि उस महिला ने पहले रिपोर्ट कर दी होती, तो डॉक्टर भी गिरफ्तार हो जाते। एक ही घटना में दोनों अलग-अलग दिशाओं से खतरा था।
अब आप विचार करिए कि यह कानून कितना गलत है। इस महिला सशक्तिकरण के भय के कारण अनेक महिलाएँ परेशान हैं। पहले अनेक महिलाएँ बड़े-बड़े लोगों के यहाँ नौकरी करके अथवा साफ-सफाई करके अपनी रोज़ी-रोटी भी चलाती थीं और साथ में उनसे कुछ शारीरिक संबंध के माध्यम से अतिरिक्त लाभ भी उठाती थीं, लेकिन अब दोनों तरफ से भय बन गया है। पुरुषों में डर हो गया है और महिलाओं में भी ब्लैकमेलिंग की चालाकी घर कर गई है। इसका नुकसान पुरुष को अधिक हो रहा है या महिलाओं को, इस संबंध में मेरा यह विचार है कि महिलाओं को ही नुकसान हो रहा है। परेशान महिलाएँ इस तरह के मनचले पुरुषों को विश्वास नहीं दिला पा रही हैं, क्योंकि इस प्रकार के संबंधों में वर्तमान कानून ने विश्वास की एक बहुत बड़ी दीवार खड़ी कर दी है।
इसलिए डॉक्टर और नर्स की घटना को दिमाग में रखते हुए हमें इस प्रकार के महिला सशक्तिकरण के कानून को तत्काल समाप्त करके महिला-पुरुष के भेदभाव के कानून हटाने की बात सामने लानी चाहिए।
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