वर्ग संघर्ष की राजनीति के विरुद्ध तीसरे पक्ष की आवश्यकता

वर्तमान भारत की राजनीतिक व्यवस्था में दो विचारधाराएँ अलग-अलग इकट्ठी हो गई हैं। एक विचारधारा वर्ग निर्माण और वर्ग संघर्ष का सहारा लेती है, दूसरी विचारधारा वर्ग समन्वय की दिशा में बढ़ना चाहती है। पहली विचारधारा को हम तिकड़ी कहते हैं और दूसरी विचारधारा को राष्ट्रीय कहते हैं। पहली विचारधारा अलग-अलग समय पर अलग-अलग वर्ग संघर्ष के प्रयोग करती है।

मुझे अच्छी तरह याद है कि पहले सोनिया गांधी महिला सशक्तीकरण की आवाज उठाती थीं और सरकार ने उनकी बात को मानकर उनके वर्ग संघर्ष की हवा निकाल दी। उसके बाद राहुल गांधी ने जाति जनगणना और जातीय आरक्षण बढ़ाने की माँग की। सरकार ने भी इन दोनों दिशाओं में आगे बढ़कर राहुल गांधी की माँग को कमजोर कर दिया। उसके बाद राहुल गांधी ने उत्तर-दक्षिण का मुद्दा उठाया और सरकार ने उस मुद्दे पर भी समझौता करके उसकी हवा निकाल दी। तिकड़ी ने युवा सशक्तीकरण का मुद्दा उठाया है और यह वर्ग संघर्ष भी बहुत बड़ा रूप ले रहा था, लेकिन मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी ने ठीक समय पर हस्तक्षेप करके विपक्ष की इस योजना की हवा निकाल दी है। अब सत्ता पक्ष स्वयं ही युवा सशक्तीकरण की बात करने लगा है। जल्दी ही तिकड़ी कोई नया वर्ग संघर्ष करने का मार्ग खोजेगी और सरकार भी उस दिशा में आगे बढ़कर उनकी हवा निकाल देगी।

इस तिकड़ी और राष्ट्रवादी शक्तियों के बीच टकराव ने समाज का बहुत नुकसान किया है, लेकिन इसका दोष उस तिकड़ी पर जाता है, जो वर्ग संघर्ष को ही अपनी सफलता का मुख्य मार्ग मानती है और सरकार के सामने मजबूरी हो जाती है कि वह उसकी हवा निकाल दे। फिर भी हम, आप जो समाज के लोग हैं, हम आप इस दिशा में गंभीरता से सोचें। क्या वर्ग संघर्ष के यह टकराव समाज के लिए घातक नहीं हैं? इन परिस्थितियों में हमें किसी एक पक्ष का सहयोग न करके एक तीसरा पक्ष बनने का प्रयत्न करना चाहिए, जिसमें कोई वर्ग संघर्ष, वर्ग विद्वेष नहीं होगा। हम पूरी ताकत से तिकड़ी का विरोध करेंगे। आवश्यकता होने पर हम सरकार का समर्थन भी कर सकते हैं, लेकिन हम वर्ग संघर्ष की जगह वर्ग समन्वय को प्राथमिकता देंगे।

हम युवा सशक्तीकरण, महिला सशक्तीकरण, दलित सशक्तीकरण, उत्तर-दक्षिण सशक्तीकरण के विरुद्ध हैं। हम समाज सशक्तीकरण के पक्षधर हैं। हम परिवार सशक्तीकरण के पक्षधर हैं, जहाँ इन सभी समस्याओं का संयुक्त समाधान संभव है।