दुर्घटनाओं पर सवाल, हत्याओं पर खामोशी क्यों?
कल दिल्ली में एक दुर्घटना हुई, जिसमें एक मकान मालिक की लापरवाही से एक बड़ा मकान गिर गया और उसमें सात बच्चे मर गए, एक-दो और भी संख्या बढ़ सकती है। वहीं दिल्ली में कल दो-तीन ऐसी हत्याएँ हुईं, जिनमें किसी की कोई गलती नहीं थी, बल्कि पूरी तरह अपराधी घटनाएँ थीं। लेकिन आश्चर्य है कि मकान गिरने की घटना को देश भर में अधिक हाईलाइट किया गया, हत्याओं को नेगलेक्ट किया गया।
मकान गिरने की घटना के मामले में सारा मीडिया दिनभर व्यस्त रहा। यह दुर्घटना नहीं, हत्या है। इसमें मकान मालिक को गंभीर से गंभीर दंडित होना चाहिए। उच्च न्यायालय भी तुरंत हरकत में आ गया। उसने भी कई तरह के सवाल खड़े किए। सरकार के सभी विभाग सक्रिय हो गए। प्रधानमंत्री ने भी दुर्घटना पर दुख व्यक्त किया। छात्र नेताओं ने भी इस घटना को बहुत गंभीर माना। राहुल गांधी ने भी कई प्रश्न पूछे। अगर प्रश्न पूछने वालों की कुल संख्या जोड़ी जाए, ऐसा लगता है कि हर बेकार आदमी प्रश्न पूछने के लिए तैयार बैठा है, उत्तर देने वाला कोई नहीं है।
सब लोग प्रश्न पूछकर अपना नाम मीडिया में जुड़वाना चाहते हैं कि वह सक्रियता में पीछे नहीं है। दूसरी ओर हत्याओं पर कोई प्रश्न पूछने वाला नहीं है, जबकि हत्याएँ अपराध हैं, दुर्घटनाएँ लापरवाही हैं। ऐसा लगता है कि भारत में कुछ अक्रियाशील लोगों की एक फौज तैयार हो गई है, जो केवल प्रश्न पूछना जानती है, उत्तर देना नहीं।
सरकार ने भी आनन-फानन में कुछ लोगों को जेल में बंद कर दिया, कुछ सरकारी अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया। ऐसा लगता है जैसे भविष्य में ऐसी घटनाएँ कम हो जाएँगी। लेकिन इस तरह की दुर्घटनाएँ देखें तो हमें 70 वर्ष बीत गए हैं। प्रश्न खड़ा होता है कि सरकार की जिम्मेदारी हत्याओं को रोकना है या दुर्घटनाओं को रोकना।
प्रश्न पूछने वाले उत्तर देने की कोशिश क्यों नहीं करते? क्या मीडिया की कोई जिम्मेदारी नहीं है? क्या मीडिया 10 दिन पहले सूचना नहीं दे सकता था? क्या प्रश्न पूछने वाले नेताओं की कोई उत्तरदायित्व नहीं है? अब समाज के लिए यह उचित है कि वह इन प्रश्न पूछने वालों से प्रश्न पूछे कि आपकी जिम्मेदारी क्या है?
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