नई समाज व्यवस्था में तकनीक, श्रम और स्वतंत्रता का संतुलन
वर्तमान समय में भारत की संपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था का मुख्य संचालन नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत मिलकर कर रहे हैं। हमारी तीन प्राथमिकताएं हैं। हमें दुनिया से प्रतिस्पर्धा करनी है, हमें भारत के लोगों के साथ न्याय करना है, हमें समाज को अधिक से अधिक स्वतंत्रता भी देनी है और ये तीनों काम एक साथ किए जाने जरूरी हैं। तीनों में से कोई एक अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। यही कारण है कि हम इन तीनों के बीच संतुलन बनाकर चल रहे हैं।
हमें दुनिया से कंपटीशन करना है। इसके लिए हमें अधिक से अधिक उन्नत तकनीक का विकास करना होगा, क्योंकि दुनिया तकनीक की दिशा में तेज गति से बढ़ रही है और इस मामले में भारत बहुत पीछे है। हमें बहुत तेज गति से तकनीक का विस्तार करना होगा। दूसरी बात है कि हमें आम लोगों को न्याय देने के लिए श्रम का महत्व भी बढ़ाना पड़ेगा। जब तक श्रम का महत्व नहीं बढ़ेगा, तब तक तकनीक और न्याय का संतुलन नहीं हो पाएगा। सबसे नीचे के लोगों का आर्थिक विकास श्रम की ही सबसे अधिक भूमिका है और श्रम तथा तकनीक एक-दूसरे के विपरीत हैं। इसलिए श्रम और तकनीक का संतुलन हमारी उच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
एक तीसरी बात भी है कि हमें समाज को अधिक से अधिक स्वतंत्रता का अनुभव कराना चाहिए। एक जमाना था, जब एकता में अनेकता का नारा बुलंद किया जाता था। अब हम नई समाज व्यवस्था में अनेकता में एकता का नारा बुलंद करना चाहते हैं। इस तरह हमारी वर्तमान सरकार और समाज व्यवस्था एक संतुलन बनाकर कार्य कर रही है। हम भौतिक प्रगति, अधिकतम न्याय और स्वतंत्रता का संतुलन बनाकर वर्तमान समाज के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।
हमें भौतिक स्तर पर दुनिया से कंपटीशन करना है, हमें स्थानीय स्तर पर श्रम के साथ न्याय करना है और हमें सामाजिक स्तर पर समाज को अधिक शक्तिशाली बनाना है। इन तीनों कार्यों में नरेंद्र मोदी, मोहन भागवत, गांधीवादी, आचार्यकुल, आर्य समाज, गायत्री परिवार, मां संस्थान आदि लगातार सक्रिय हैं। दूसरी तरफ हमारी सारी योजना को असफल करने के लिए साम्यवादी, कट्टरवादी मुसलमान, नेहरू परिवार तथा कुछ अन्य विपक्षी नेता भी दिन-रात एक किए हुए हैं।
आप गंभीरता से सोचिए कि हम तकनीक का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहते हैं। हम तेज गति की रेलगाड़ियां चलाना चाहते हैं। दूसरी ओर हमारे विपक्ष के नेता यह आवाज उठाते हैं कि हमें अपनी स्थानीय व्यवस्था का सुधार करना है, हमें तेज रेलगाड़ियों की जगह वर्तमान रेलगाड़ियों की हालत सुधारनी है। हम तेज गति से उत्पादन बढ़ाना चाहते हैं तो विपक्ष के नेता पर्यावरण, मानवाधिकार अथवा अन्य किसी न किसी आधार पर हमारे उत्पादन में बाधा पैदा करना चाहते हैं। वे उत्पादन की जगह न्यायसंगत वितरण को अधिक आवश्यक मानते हैं।
हम बहुत तेज गति से डीजल-पेट्रोल का मूल्य बढ़ाकर श्रम के साथ न्याय करना चाहते हैं तो हमारे विपक्षी नेता डीजल-पेट्रोल की मूल्य वृद्धि के मामले में अपनी जान देने के लिए तैयार हो जाते हैं। हम सामाजिक एकता के पक्षधर हैं तो हमारे विपक्षी नेता वर्ग संघर्ष बढ़ाने का प्रयत्न कर रहे हैं। आप देखिए कि पिछले एक वर्ष में ही विपक्ष ने महिलाओं के नाम पर, दलितों के नाम पर, युवाओं के नाम पर कितने नए-नए वर्ग संघर्ष खड़े कर दिए। परिणाम हुआ कि हमारी सामाजिक एकता लगातार टूटती जा रही है।
सौभाग्य है कि भारत की जनता अब इन विपक्षियों को अच्छी तरह समझने लग गई है और धीरे-धीरे उनकी ताकत कमजोर हो रही है, लेकिन वह मरते तक अपने मार्ग बदलने के लिए तैयार नहीं है। वर्ग संघर्ष एक तरह से उनके खून में समा गया है और वह वर्ग संघर्ष को ही सबसे सफल आधार मान रहे हैं। अब जल्दी ही विपक्ष-मुक्त भारत बनाने का समय आ गया है, जिससे हम तेज गति से अपने कार्य को आगे बढ़ा सकें।
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