रामचंद्र गुहा की देर से हुई स्वीकारोक्ति
रामचंद्र गुहा एक बड़े वामपंथी विचारक माने जाते हैं। वे हमेशा नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत के नेतृत्व वाली व्यवस्था के खिलाफ खुलकर अभियान चलाते रहते हैं। उन्हें वामपंथियों और कांग्रेसियों का खुला समर्थन भी मिलता है।
लेकिन बंगाल और असम के चुनावों के बाद रामचंद्र गुहा ने यह निष्कर्ष निकाला कि जब तक भारत के सर्वोच्च नेता अपनी पारिवारिक सीमाओं से बाहर नहीं निकलेंगे, तब तक विपक्ष इसी तरह पराजित होता रहेगा। राहुल गांधी एक बहुत ही भले और शरीफ व्यक्ति हैं, लेकिन उनमें राजनीतिक योग्यता की कमी है। सोनिया गांधी ने राहुल गांधी को आगे करके भूल की है। वही भूल ममता बनर्जी ने भी की है और वही भूल तमिलनाडु में भी हुई है। अब भारत की आम जनता परिवार नहीं, बल्कि योग्यता खोज रही है।
मैं पढ़ रहा हूँ कि लगभग सभी विपक्षी नेताओं ने रामचंद्र गुहा की इस स्पष्ट स्वीकारोक्ति की आलोचना की है। लेकिन मैं यह महसूस करता हूँ कि रामचंद्र गुहा ने देर से ही सही, वास्तविकता को स्वीकार किया है।
मैंने स्वयं 15 वर्ष पहले, जब नरेंद्र मोदी चुनाव नहीं लड़ रहे थे, उस समय भी यही लिखा था कि राहुल गांधी जैसे शरीफ व्यक्ति को मनमोहन सिंह की जगह आगे बढ़ाने का सोनिया गांधी का प्रयास बहुत घातक होगा। अंत में वही हुआ जो मैंने लिखा था।
आज इतने वर्षों के बाद रामचंद्र गुहा ने इस सच को स्वीकार किया है। मुझे लगता है कि धीरे-धीरे अनेक लोग इस वास्तविकता को स्वीकार करते जाएंगे और विपक्ष के लोग इसी तरह हाय-हाय चिल्लाते रहेंगे।
सबको यह सच्चाई स्वीकार कर लेनी चाहिए कि परिवारवाद का लोकतंत्र में कोई भविष्य नहीं है।
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