सिया गोयल प्रकरण और बदलती सामाजिक चुनौतियाँ: परिवार, समाज और कानून पर पुनर्विचार की आवश्यकता

2 दिन पहले सिया गोयल, पुणे का मामला समाज के सामने आया। विस्तृत विवरण लगातार मीडिया में आ रहा है। इसके पहले भी गुवाहाटी में ठीक ऐसा ही मामला घटित हो चुका है। भविष्य में भी इस तरह के मामले बढ़ सकते हैं। प्रश्न यह नहीं है कि ये मामले बढ़ रहे हैं, बल्कि मुख्य प्रश्न यह है कि इस तरह के मामले क्यों बढ़ रहे हैं और इनका समाधान क्या है।

आमतौर पर भारत में अनेक परिवारों में इस प्रकार की या इससे मिलती-जुलती घटनाएं होती हैं। लेकिन आमतौर पर या तो इस प्रकार की घटनाएं अप्रत्याशित होती हैं अथवा किसी धोखा देने वाले के साथ ऐसी घटनाएं होती हैं, लेकिन धोखा देकर किसी निर्दोष की हत्या के मामले यदा-कदा ही सामने आते हैं, जैसा सिया गोयल या गुवाहाटी की घटना में सामने आया।

कारण स्पष्ट है। कहीं न कहीं हमारी परिवार व्यवस्था, समाज व्यवस्था और संवैधानिक व्यवस्था में ऐसी कमजोरियां या गड़बड़ियां मौजूद हैं, जिनके कारण इस प्रकार की घटनाएं बढ़ रही हैं। मैंने तो बहुत पहले ही इस प्रकार की घटनाएं बढ़ने की चेतावनी दे दी थी और अपने लोगों को सावधान भी किया था।

इन सब में सेक्स एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। सेक्स के मामले में परिवार, समाज और कानून जिस प्रकार की गलतियां कर रहे हैं, उसके दुष्परिणाम इसी तरह के आएंगे। आपने एक तरफ बाल विवाह पर रोक लगा दी, वेश्यालयों पर रोक लगा दी, सामाजिक नियम बहुत कठोर कर दिए और दूसरी तरफ सेक्स को प्राकृतिक अधिकार न मानकर उसे सामाजिक अधिकार मान लिया। यह मूर्खता अपराधियों ने नहीं की है, यह मूर्खता हम-आपने की है।

हमें नए सिरे से इस पूरी व्यवस्था पर विचार करना होगा। हमें बाल विवाह और सेक्स के बारे में फिर से नई सोच बनानी होगी। परिवारों में बच्चों को विवाह के मामले में अधिक स्वतंत्रता देनी चाहिए। उनकी इच्छाओं का अधिक सम्मान होना चाहिए। समाज को भी सेक्स के मामले में और अधिक उदार होने की जरूरत है।

सरकार को तो इस मामले में सारे बने हुए कानून हटा ही लेने चाहिए। समाज के कठोर कानून स्वतंत्रता के उल्लंघन के अवसर देते हैं। समाज सिर्फ अनुशासन रख सकता है, शासन नहीं कर सकता। इसलिए मेरा यह विचार है कि इस मामले में परिवार व्यवस्था, समाज व्यवस्था और कानून व्यवस्था को बैठकर अपनी कमजोरी को दूर करना चाहिए।