लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमी और उसका समाधान
हम आज इस विषय पर विचार कर रहे हैं कि वर्तमान लोकतंत्र में कौन-सी कमी है, जो वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था को सफल नहीं होने दे रही है, और इस कमी का समाधान क्या है।
मैं इस बात से सहमत हूँ कि लोक का कोई भौतिक स्वरूप बना हुआ नहीं है। दूसरी बात यह है कि हर मामले में जनमत-संग्रह संभव भी नहीं है। तीसरी बात यह है कि मैनेजर, संरक्षक और प्रतिनिधि के बीच बहुत अंतर होता है। वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था इन तीनों का अंतर समझने में असमर्थ है।
मैनेजर कानून बना सकता है, कानून का पालन करा सकता है, लेकिन संविधान नहीं बना सकता। संविधान-निर्माण में संरक्षक, प्रतिनिधि और मैनेजर—तीनों की समान भूमिका होनी चाहिए। यदि ये तीनों सर्वसम्मत न हों, तो उस स्थिति में मालिक अर्थात् जनता को जनमत-संग्रह के द्वारा निर्णय करना चाहिए।
वर्तमान लोकतंत्र में कुछ सुधार करते हुए प्रतिनिधि, संरक्षक और मैनेजर को अलग-अलग किया जाए। यदि संसद को हम प्रतिनिधि बनाना चाहते हैं, तो उस स्थिति में संसद को संविधान बनाने तक सीमित कर दिया जाए। कानून बनाने का कार्य हम मैनेजर को दें।
अब यह तय करना हम सबका काम है कि मैनेजर कौन होगा, प्रतिनिधि कौन होगा, संरक्षक कौन होगा और तीनों की शक्तियाँ तथा सीमाएँ क्या होंगी। हम लगातार इस विषय पर चिंतन कर रहे हैं।
हमारा यह मानना है कि हम इस त्रिस्तरीय व्यवस्था को परिवार से शुरू कर सकते हैं। अर्थात् परिवार में एक मैनेजर होगा, जिसे परिवार का मुखिया माना जाएगा; एक संरक्षक होगा, जिसे हम परिवार का प्रमुख कह सकते हैं; और एक संविधान सभा होगी, जिसकी मुख्य भूमिका संविधान-संशोधन तक सीमित रहेगी।
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