नई समाज व्यवस्था में संविधान सभा की भूमिका
30 जुलाई प्रातःकालीन सत्र
सिद्धांत अलग होते हैं, व्यवहार अलग होता है और इन दोनों के तालमेल से ही नीतियाँ बनती हैं। पुराने जमाने में यह एक नीति थी कि ब्राह्मण को कभी राजा नहीं होना चाहिए। यह नीति वास्तव में सिद्धांत और व्यवहार के तालमेल से बनाई गई थी। लेकिन इसके साथ यह भी नीति जुड़ी हुई थी कि राजा को ब्राह्मण से ही मंत्रणा करनी चाहिए। अर्थात राजा और ब्राह्मण दोनों मिलकर नीति बनाएं। सिद्धांत और व्यवहार का पूरा तालमेल चलते रहना चाहिए।
यही वास्तव में लोकतांत्रिक सिद्धांत भी है कि विधायिका और कार्यपालिका दोनों ही मिलकर कानून बनाएं। लेकिन दिक्कत तब पैदा हुई, जब विधायिका ने जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। विधायिका को केवल सिद्धांतों तक सीमित रहना चाहिए था, लेकिन वह कार्यपालिका के हर मामले में दखल देने लगी। विधायिका के लोग ही कार्यपालिका में जाएंगे, यह सिद्धांत पूरी तरह मूर्खतापूर्ण था।
यही कारण है कि हम लोग विधायिका के रूप में एक अलग से संविधान सभा का प्रस्ताव दे रहे हैं। संविधान सभा अप्रत्यक्ष रूप से मार्गदर्शक होगी, लेकिन संविधान बनाने में जितना संविधान सभा का हस्तक्षेप होगा, उतना ही तंत्र का भी होगा। अर्थात तंत्र या संविधान सभा, कोई भी उसमें वरीय नहीं होगा। दोनों बराबरी के आधार पर मिलकर ही संविधान का प्रस्ताव तैयार करेंगे। यदि दोनों के बीच अंतिम रूप से कोई असहमति हो जाती है, तो ऐसे मामलों में जनमत-संग्रह होगा। राज्य के कार्य में संविधान सभा का दखल नहीं होना चाहिए और संविधान सभा पर राज्य की वरीयता नहीं होनी चाहिए।
Comments