आंदोलन, न्याय और नई समाज व्यवस्था
28 जुलाई प्रातःकालीन सत्र।
अब तक की दुनिया में हम यह मानकर चलते रहे हैं कि औसत भारतीय सच बोलता है, इसलिए उसके कथन को सत्य मानकर उस पर परीक्षण किया जाना चाहिए और जब तक उसका कथन झूठ न हो, तब तक सच माना जाएगा। लेकिन हम इस धारणा को पूरी तरह बदल रहे हैं। अब हमारा यह मानना है कि औसत भारतीय झूठ बोलता है और जब तक उसका सच प्रमाणित न हो जाए, तब तक उसे सच नहीं माना जाना चाहिए। इस तरह हम वर्तमान सामाजिक धारणा में बदलाव कर रहे हैं। इसीलिए हम यह भी बदलाव कर रहे हैं कि प्रारंभिक जांच में यदि कोई व्यक्ति अपराधी सिद्ध हो जाता है, तो अपने को निर्दोष प्रमाणित करने की जिम्मेदारी उस संदिग्ध व्यक्ति की होगी। वह संदिग्ध माना जाएगा, निरपराध नहीं। वर्तमान दुनिया की न्यायिक अवधारणा को हम बदलना चाहते हैं, इसलिए हम नया सिस्टम बना रहे हैं, जिसके अनुसार पुलिस द्वारा अपराध सिद्ध व्यक्ति संदिग्ध अपराधी माना जाएगा, निरपराध नहीं। साथ ही हम यह भी अवधारणा बनाएंगे कि संदिग्ध व्यक्ति यदि सच नहीं बताता है, तो उसका अपराध प्रमाणित माना जाएगा। इस तरह हम समाज सिद्धांत और न्याय सिद्धांत में बदलाव करेंगे। न कोई अपराधी छूट सके, न कोई निरपराध दंडित हो, हम यह नया न्याय सिद्धांत बना रहे हैं।
मैंने कई वर्ष पहले ही सरकार को यह बात कही थी कि आप सारे सरकारी स्कूल या तो बंद कर दीजिए या स्थानीय संस्थाओं को जिम्मा दे दीजिए। आप यदि चाहें तो बाहर से उन स्थानीय संस्थाओं की मदद कर सकते हैं, लेकिन सरकारी स्कूल चलाना पूरी तरह घातक होगा। लेकिन हमारी सरकार ने कभी मेरी बात नहीं मानी और सफेद हाथी के समान सरकारी स्कूलों को अनावश्यक ढोते रहे। अब यह बात साफ हो रही है कि सारे देश भर में मिलाकर प्रतिवर्ष लगभग 10000 सरकारी स्कूल अपने आप बंद हो रहे हैं, क्योंकि वहां छात्र नहीं हैं। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। सरकार को पहले ही यह अनुमान लगा लेना चाहिए था कि सरकारी स्कूलों का कोई भविष्य नहीं है। अभी भी समय नहीं बीता है। सरकार को मेरी बात गंभीरता से सुननी चाहिए। आप सभी सरकारी स्कूलों को बंद कर दीजिए। यदि आप गरीब बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, तो उनकी शिक्षा के लिए बाहर से सब्सिडी दे दीजिए और वह किसी भी स्कूल में पढ़ने के लिए स्वतंत्र रहें। किसी भी सरकारी अफसर या नेता के बच्चे सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ते, क्योंकि सरकारी स्कूल सफेद हाथी सिद्ध हो रहे हैं। वे केवल सरकार को ब्लैकमेल करने का जरिया हैं। सरकारी स्कूल लूटपाट का धंधा हैं, बाकी और कुछ नहीं है। इसलिए अभी भी मेरा यह कहना है कि सरकार एक नीति बनाकर सरकारी स्कूलों को पूरी तरह स्वतंत्र कर दे।
हम आज दिनभर आंदोलन की चर्चा करके इस विषय को समाप्त कर देंगे। जो छात्रों का आंदोलन हुआ है, इस तरह के आंदोलन कोई नई बात नहीं है। जब तक समाज में वर्ग बने हुए हैं, तब तक यदि किसी वर्ग के लोग किसी बात पर एकजुट होकर इस तरह का आंदोलन करते हैं, तो इस तरह के आंदोलन वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में समाज के लिए एक समस्या बन जाते हैं, क्योंकि समाज एकजुट होता नहीं है और वर्ग के लोग इकट्ठे हो जाते हैं। इस तरह की वर्ग-अनुकूल भावनाएं एक बड़ी समस्या का रूप ग्रहण कर लेती हैं। ऐसे ही आंदोलन महिलाओं के नाम पर भी होते रहे हैं, किसानों के नाम पर भी होते रहे हैं, भाषा के नाम पर भी होते रहे हैं और इस बार युवाओं के नाम पर इस तरह के आंदोलन हुए। हर बार हमारी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को झुकना पड़ा, क्योंकि वर्तमान लोकतांत्रिक तरीका ही ऐसा है कि वहां आंदोलनकारियों के साथ समझौता करने के अतिरिक्त हमारे पास कोई मार्ग नहीं बचता। इसलिए मैं इस विषय पर कई बार लिख चुका हूं कि हम इस तरह के आंदोलन का विरोध नहीं कर पाए, क्योंकि शांतिपूर्ण आंदोलन करना एक संवैधानिक अधिकार है और व्यवस्था परिवर्तन के लिए आंदोलन के अतिरिक्त कोई भी अन्य संवैधानिक व्यवस्था अभी तक बनी ही नहीं है। प्रश्न यह उठता है कि यदि लोग आंदोलन न करें, विरोध न करें, तो व्यवस्था परिवर्तन के लिए क्या करें। इस प्रश्न का भी हमारे पास कभी उत्तर नहीं रहा है, लेकिन हम लोगों ने इस प्रश्न का उत्तर खोजा है। हमारे विचार से हमारे तंत्र से हटकर एक संविधान सभा होनी चाहिए। हम यदि व्यवस्था परिवर्तन की बात करते हैं, सरकार से किसी मामले में असंतुष्ट होते हैं, तो हम संविधान सभा के पास अपनी आवाज उठा सकते हैं। इस तरह विरोध प्रकट करने के लिए किसी आंदोलन की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। इसके साथ-साथ हम यह भी चाहेंगे कि वर्ग-मुक्त समाज व्यवस्था बने। संगठन की पहली इकाई परिवार हो, दूसरी इकाई ग्राम सभा हो, तीसरी इकाई जिला सभा हो, चौथी इकाई परिवार सभा हो और पांचवीं इकाई राष्ट्र सभा हो। इस तरह हम परिवार से लेकर राष्ट्र सभा तक अपनी इच्छा को व्यक्त कर सकते हैं। हम संविधान सभा के सामने अपना विरोध भी प्रकट कर सकते हैं और यदि इसके बाद भी कोई विरोध प्रकट करना चाहता है, तो हम उस विरोध को असंवैधानिक मानेंगे, गलत मानेंगे, समाज-विरोधी कार्य मानेंगे। हम किसी भी प्रकार के अन्य तरीके को प्रतिबंधित कर लेंगे।
आज हम इस आंदोलन की चर्चा की अंतिम कड़ी लिखकर चर्चा को समाप्त करेंगे। इस आंदोलन से हमें चार नए अनुभव प्राप्त हुए हैं।
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इस आंदोलन में हमारी सामाजिक व्यवस्था पर एक संकट खड़ा किया है, क्योंकि आंदोलन में जिस तरह सामाजिक गंदगी का प्रदर्शन हुआ और आंदोलन समाप्त होने के बाद आंदोलन के प्रमुख लोगों ने होटल में जो गंदा उदाहरण प्रस्तुत किया, उसने हमारे सामने एक प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
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इसके पहले किसी भाषा आंदोलन, किसान आंदोलन या अन्य आंदोलन से हमारी सामाजिक व्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। एक निर्भया आंदोलन के नाम से जो महिला सशक्तिकरण की आवाज बुलंद हुई, उसका दुष्परिणाम हम अब तक देख रहे हैं। अब इस युवा सशक्तिकरण के नाम से आगे परिवार व्यवस्था को और नुकसान हो सकता है, उसके भी दुष्परिणाम देखने को मिलेंगे, क्योंकि युवा आंदोलन के नाम से एक अभारतीय संस्कृति का नंगा प्रदर्शन किया गया।
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यह बात सिद्ध हुई कि युवा शक्ति पर साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव अभी कम नहीं हुआ है। मेरे एक कम्युनिस्ट मित्र राज नारायण गुप्ता जी ने मुझे यह लिखा भी कि संघ परिवार युवा शक्ति को अपने साथ जोड़ने में सफल नहीं हुआ है। मेरे विचार से संघ परिवार ही नहीं, हम सब मिलकर भी अब तक युवा शक्ति को साम्यवादियों से बचाने में सफल नहीं हो सके हैं और हमें इस विषय पर और भी अधिक सक्रिय होना पड़ेगा।
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भले ही हम साम्यवाद को भारत में कमजोर करने में सफल दिख रहे हों, लेकिन दुनिया में अभी साम्यवाद कमजोर नहीं पड़ रहा है और न ही कमजोर होने के कोई लक्षण दिख रहे हैं।
इस तरह हम इस निष्कर्ष तक पहुंच चुके हैं कि इस आंदोलन के परिणामस्वरूप हमें साम्यवाद पर कुछ और सक्रिय होकर सोचना पड़ेगा। हम सबने यह चुनौती स्वीकार की है।
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