लोक स्वराज ही आदर्श लोकतंत्र
13 सितंबर प्रातः कालीन सत्र। हम वर्तमान समय में पूरे भारत में देख रहे हैं कि राजनीतिक व्यवस्था में लगभग पूरा भ्रष्टाचार है, सत्ता के दुरुपयोग का भी खतरा है। सामाजिक व्यवस्था में भी भ्रष्टाचार बढ़ रहा है और पावर के दुरुपयोग का भी मामला सामने आ रहा है। यह एक पुराना सिद्धांत है कि जब पावर कहीं इकट्ठा होता है तो भ्रष्टाचार के अवसर पैदा होते हैं। इस तरह के भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करना बहुत कठिन हो जाता है। या तो नियंत्रण की बहुत मजबूत व्यवस्था हो या यह भ्रष्टाचार पैदा ही कम हो। मेरे विचार से हम भ्रष्टाचार पर नियंत्रण की मजबूत व्यवस्था नहीं कर सकते, क्योंकि भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे तक फैल चुका है, इसलिए अच्छा होगा कि हम भ्रष्टाचार की उत्पत्ति को ही रोक दें। अर्थात पावर कहीं इकट्ठा न होने दें। राजसत्ता के पास भी पावर इकट्ठा न हो, समाज सत्ता के पास भी पावर इकट्ठा न हो, परिवार में भी किसी एक व्यक्ति के पास बहुत अधिक पावर इकट्ठा होना घातक है। इसलिए हमें पावर को बाँटना चाहिए। यही वास्तव में लोक स्वराज्य है, यही आदर्श लोकतंत्र है, यही हमारी आदर्श समाज व्यवस्था है। यही कारण है कि हम लोग लगातार सत्ता के विकेंद्रीकरण के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं और यह विकेंद्रीकरण राज्य से लेकर समाज और समाज से लेकर परिवार तक होना चाहिए।
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