महिला और पुरुष के बीच समानता आवश्यक है

प्रकृति में महिलाओं और पुरुषों का पूरी तरह संतुलन होता है। कुछ मामलों में महिलाओं में विशेषताएँ होती हैं, कुछ मामलों में पुरुषों में होती हैं, लेकिन होता सब बराबर है। इसी तरह आपराधिक और धूर्तता के मामले में भी महिला-पुरुष करीब-करीब बराबर हैं। पुरुषों में बल प्रयोग और अत्याचार करने की अधिक योग्यता है तो महिलाओं में धोखा देने और ब्लैकमेल करने की योग्यता अधिक होती है, होता सब कुछ बराबर है। लेकिन पुराने समय में पुरुषों ने महिलाओं को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया, उन्हें कम अधिकार दिए, यहाँ तक कि कुछ धर्मों में तो महिलाओं की विश्वसनीयता भी आधी मान ली गई। अब जमाना बदला, अब महिलाओं को अधिक अधिकार दिए जा रहे हैं और आमतौर पर पुरुषों को अपराधी माना जा रहा है। अब महिलाओं की ब्लैकमेल करने की शक्ति को अधिक महत्व दिया जा रहा है। अब ऐसा प्रचारित किया जा रहा है कि आमतौर पर पुरुष अपराधी होता है और महिलाएँ झूठ नहीं बोलती हैं। परिणाम वही है जो पहले था। अब महिलाओं की जिस तरह ब्लैकमेल करने की ताकत बढ़ रही है, उस तरह पुरुष दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखा जा रहा है। न पुरानी स्थिति अच्छी थी, न वर्तमान स्थिति अच्छी है। न पुरुषों को अधिक आक्रामक होना चाहिए, न महिलाओं में ब्लैकमेलिंग की ताकत बढ़ानी चाहिए। महिला और पुरुष सबको बराबरी का अधिकार दे दिया जाए, अन्यथा यह महिला-पुरुष का वर्ग संघर्ष हमेशा चलता रहेगा।