छत्तीसगढ़ के सरगुजा से सोमनाथ तक: मानवता की प्रेरक मिसाल

19 जुलाई प्रातःकालीन सत्र

मैं बहुत लंबे समय से कहता रहा हूँ कि मनुष्य केवल दो ही प्रकार के होते हैं—अच्छे और बुरे। अभी-अभी इसका एक उदाहरण देखने को मिला। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के उदयपुर ग्राम का एक व्यक्ति सोमनाथ तीर्थयात्रा पर गया था। वह भूलवश जलगांव स्टेशन पर दूसरी ट्रेन में चढ़ गया। उसके पास न तो कपड़े बचे थे और न ही पैसे। वह 25 दिनों तक भटकता रहा, लेकिन अंततः 25 दिन बाद सुरक्षित अपने घर उदयपुर लौट आया।

इस दौरान रास्ते में आम लोगों ने उसे भोजन कराया, आने-जाने की व्यवस्था की। ट्रेन में टीटी ने उससे टिकट नहीं माँगा और बस चालक ने भी दया करके उसे निःशुल्क यात्रा करा दी। आश्चर्य की बात यह है कि 25 दिनों तक भटकने के बाद भी वह पूर्णतः स्वस्थ अपने घर लौट आया। किसी ने उसकी जाति नहीं पूछी, किसी ने उसका धर्म नहीं पूछा। उसे सहायता करने वाले लोग किस जाति या धर्म के थे, यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया।

स्पष्ट है कि आज भी मानवता जीवित है। लेकिन यही मानवता तब विचलित हो जाती है, जब धर्म, जाति, राष्ट्र अथवा अन्य संगठनात्मक सीमाएँ उस पर हावी हो जाती हैं। यही कारण है कि मैं अपने सभी मित्रों को सलाह देता हूँ कि धर्म, जाति और राष्ट्र से ऊपर समाज को मानें। मेरे विचार में समाज ही सबसे ऊपर है।

आज प्रातः मैंने एक घटना का उल्लेख करते हुए लोगों की दान-प्रवृत्ति की प्रशंसा की। साथ ही, मैं लंबे समय से अपने सभी साथियों को यह सलाह भी देता रहा हूँ कि किसी भी प्रकार का दान बहुत सोच-समझकर करना चाहिए। पहली दृष्टि में ये दोनों बातें विरोधाभासी प्रतीत हो सकती हैं, और यह बात सही भी है।

मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि समाज में सामान्यतः लगभग 90 प्रतिशत लोग सीधे-सादे और ईमानदार होते हैं। समझदार लोगों का प्रतिशत लगभग 4–5 प्रतिशत होता है और ठग, धूर्त तथा अपराधियों का प्रतिशत भी लगभग 4–5 प्रतिशत के आसपास रहता है।

यदि हम अपने आपको समझदार मानते हैं, तो हमें दान देने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि हमारे पास अपने धन का उपयोग करने के अधिक प्रभावी और रचनात्मक माध्यम उपलब्ध हो सकते हैं। ऐसे में हम अपने संसाधनों को उन कार्यों में लगा सकते हैं, जहाँ उनका अधिक स्थायी और सकारात्मक परिणाम मिले।

दूसरी ओर, जिन लोगों के पास ऐसे विकल्प उपलब्ध नहीं हैं, वे यदि दान देते हैं तो वे कोई बुरा कार्य नहीं करते। यदि आप अपने आपको उन 90 प्रतिशत सामान्य लोगों में मानते हैं, तो आप दान देते रहिए। लेकिन यदि आप अपने आपको उन 5 प्रतिशत लोगों में मानते हैं, जो हर निर्णय सोच-समझकर लेते हैं, तो दान भी बहुत विचारपूर्वक कीजिए। यह सुनिश्चित करने का प्रयास कीजिए कि आपका दान किसी धूर्त या ठग के हाथ में न पहुँचे।

इसी कारण मैं अपने सभी समझदार मित्रों को दान के विषय में विशेष सावधानी बरतने की सलाह देता हूँ। समझदार लोगों की संख्या कम होती है, जबकि सीधे-सादे लोगों की संख्या बहुत अधिक होती है। यदि आप दान न भी दें, तो संभव है कि वह कार्य किसी अन्य माध्यम से चल जाए; लेकिन यदि आप अपने संसाधनों का उपयोग किसी अधिक प्रभावी और रचनात्मक कार्य में करेंगे, तो उससे समाज को अधिक स्थायी लाभ मिल सकता है।