आर्य समाज: मेरी प्रेरणा, मेरी असहमति
31 जुलाई प्रातःकालीन सत्र।
मैंने आर्य समाज से बहुत कुछ सीखा है। मैं तो जीवन भर आर्य समाज से ही सीखता रहा हूँ और अभी भी सीख रहा हूँ। आर्य समाज के तीन सिद्धांतों ने मुझ पर बहुत प्रभाव डाला। पहला, एक व्यक्ति को अधिकतम सत्य का सहारा लेना चाहिए। दूसरा, व्यक्तिगत मामलों में प्रत्येक व्यक्ति को निर्णय की स्वतंत्रता होनी चाहिए और सामाजिक मामलों में सभी परतंत्र रहें। तीसरा, हमें दूसरों के साथ व्यवहार करते समय स्वतंत्रता अथवा समानता की जगह यथायोग्य व्यवहार का मार्ग पकड़ना चाहिए।
मैं आज भी समझता हूँ कि यथायोग्य व्यवहार का सिद्धांत सबसे अच्छा है। हम जिसके साथ व्यवहार कर रहे हैं, उसमें हमें वर्ण व्यवस्था के अनुसार अपनी योग्यता भी समझ लेनी चाहिए और साथ में दूसरे के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए, उसकी सीमाएँ भी समझनी चाहिए। किसी अपराधी और किसी अच्छे आदमी के साथ व्यवहार करने में समानता भी नहीं हो सकती, स्वतंत्रता भी नहीं हो सकती। इसलिए यथायोग्य व्यवहार सबसे अच्छी प्रणाली है। इसका मतलब यह है कि सामने वाला जिस योग्य हो, उसकी योग्यता के अनुसार ही सामाजिक या संवैधानिक व्यवस्था का लाभ मिलना चाहिए। योग्यता को सबसे ऊपर मापदंड बनाने की आवश्यकता है। स्पष्ट है कि सिद्धांत के अनुसार सभी प्रकार के आरक्षण समाप्त हो जाने चाहिए और योग्यता को पहला मापदंड बनाया जाना चाहिए।
मैंने लिखा है कि मैं आर्य समाज को मानने वाला हूँ। मैं आर्य समाज के माध्यम से वर्ण व्यवस्था और समझदारी के विकास को सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानता हूँ। लेकिन आर्य समाज की तीन बातों से मैं सहमत नहीं रहा।
पहली बात है, "कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम्", अर्थात सारी दुनिया को आर्य बनाओ। मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ। हमारा कार्य यह होना चाहिए कि हम दुनिया के सामने ऐसे विचार रखें कि लोग अपने आप आर्य बनें। हम लोगों को आर्य बनाएँ, यह लक्ष्य मुझे उचित नहीं लगता। मैं इस प्रयत्न से असहमत हूँ।
दूसरा मुद्दा यह है कि आर्य समाज मूर्ति पूजा का विरोधी है। मेरे विचार से मूर्ति पूजा न कोई अच्छा कार्य है, न कोई बुरा कार्य है। मूर्ति पूजा एक निरर्थक कार्य है। वर्तमान समय में जब नैतिकता का इतना अधिक क्षरण हो रहा है, उस समय मूर्ति पूजा पर इतनी अधिक शक्ति लगाना उचित नहीं है, क्योंकि मूर्ति पूजा कोई बुराई नहीं है।
तीसरी बात यह है कि भूत-प्रेत का अस्तित्व नहीं होता। इस संबंध में आर्य समाज को और गहराई से विचार करना चाहिए। भूत-प्रेत को मानने वाले लोग नुकसान उठाते हैं, इस बात से मैं सहमत हूँ, लेकिन भूत-प्रेत का अस्तित्व है या नहीं, इस विषय पर अभी और गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। मेरा तो यह मानना है कि प्रकृति के अनसुलझे रहस्य ही अभी भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र आदि माने जाते हैं, जिनका तब तक अस्तित्व माना जाता है, जब तक विज्ञान उन्हें खोजकर समाज के सामने प्रस्तुत नहीं कर देता।
इस प्रकार इन तीन बातों पर मेरी असहमति होते हुए भी मैं हमेशा आर्य समाज के साथ खड़ा हूँ।
Comments